त्रयोदशी व्रत कथा इन हिंदी Trayodashi vrat katha in hindi

Trayodashi vrat katha in hindi

दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से त्रयोदशी व्रत कथा इन हिंदी के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और त्रयोदशी व्रत कथा इन हिंदी के बारे में गहराई से पढ़ते हैं ।

Trayodashi vrat katha in hindi
Trayodashi vrat katha in hindi

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पूजा विधि – जो भी व्यक्ति त्रयोदशी व्रत रखता है उसको त्रयोदशी के दिन सुबह प्रातः काल उठ के सूर्यास्त से पहले स्नान करना चाहिए । स्नान करके अपने घर की साफ सफाई करके ईशान कोण दिशा में पूजा का सामान एकत्रित करके भगवान शिव की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए । भगवान शिव को घी , दूध एवं जल से स्नान कराना चाहिए । स्नान कराने के बाद बेल पत्री , फूल माला चढ़ाना चाहिए । भगवान शिव की मूर्ति के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए ।

श्वेत वस्त्र पहनकर पूजा करनी चाहिए । आसन पर बैठकर पूजा करनी चाहिए । पूजा करने के बाद शाम के 4:00 बजे तक ओम नमः शिवाय का जाप करते रहना चाहिए । जब 4:00 बज जाए तो पुनः स्नान करके दोबारा से भगवान शिव की पूजा अर्चना करनी चाहिए , आरती करना चाहिए । पूजा करने के बाद सभी को कथा सुननी चाहिए । जिस दिन त्रयोदशी होती है उस दिन कथा कही जाती है । पूजा के बाद सभी को कथा सुननी चाहिए ।

कथा सुनने के बाद हाथ जोड़कर भगवान शिव की मूर्ति के सामने यह प्रार्थना , वंदना करना चाहिए कि है भोले नाथ हमारे परिवार को सुख , शांति , समृद्धि देना । भगवान घर में जो भी समस्या है उस समस्या का निराकरण हो और हम सभी अपना जीवन सुखी एवं शांति से बिता सकें यह प्रार्थना करके । ओम नमः शिवाय का जाप निरंतर करते रहना चाहिए ।

कथा – त्रयोदशी का व्रत जिस दिन होता है उस दिन की कथा कही जाती है जैसे की त्रयोदशी का व्रत शनिवार को पड़ता है तो सनी त्रयोदशी की कथा हमें अवश्य सुननी चाहिये । एक नगर में एक बहुत ही धनवान व्यक्ति रहता था । उसके पास बहुत सारा धन , हीरा , मोती , बंगला सब कुछ था । वह भूखे मनुष्यों को भोजन करवाता था , कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाता था , हॉस्पिटल , पाठशाला आदि का निर्माण उसने अपने राज में करवाया था ।

जब वह किसी गरीब को देखता था तो उसको बहुत सा धन देकर उसकी गरीबी को कम करता था । जब कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर उसके पास जाता था तब वह उसकी समस्या का समाधान अवश्य निकालता था । राजा एक ऐसा व्यक्ति था जो किसी दूसरे का दुख नहीं देख पाता था । उसके द्वार पर जो भी व्यक्ति आता था वह खाली हाथ नहीं जाता था लेकिन दुनिया के दुख को दूर करने वाले के घर में बहुत बड़ा दुख था क्योंकि उस नगर सेठ के कोई भी संतान नहीं थी ।

वह बड़ा दुखी था । एक बार नगर सेठ और उसकी पत्नी ने तीर्थ यात्रा करने का विचार बनाया था । वह दोनो सामान एकत्रित करके तीर्थ यात्रा के लिए निकल लिए थे । पूरा राज महल , पूरा कारोबार नौकरों के अधीन छोड़ दिया था । जब वह अपने घर से निकले थोड़ी ही दूर चले  थे कि एक पीपल के पेड़ के नीचे एक साधु महाराज साधना में लीन होते हुए दिखे । नगर सेठ ने अपनी पत्नी से कहा कि हम साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर ही तीर्थ यात्रा का शुभारंभ करेंगे और वह दोनो साधु महाराज के पास पहुंचे और हाथ जोड़ कर बैठ गए ।

अब वह साधु महाराज की साधना पूरी होने का इंतजार करने लगे । देखते-देखते रात हो गई , सुबह हो गई सुबह होने के बाद साधु महाराज ने अपनी आंखें खोली तो साधु महाराज ने नगर सेठ और उसकी पत्नी को देखा कि दोनों हाथ जोड़कर खड़े हैं ।  दोनों को देखकर साधु महाराज मुस्कुराने लगे और कहने लगे कि मैं तुम्हारी परेशानी जान चुका हूं । साधु महाराज ने उन दोनों से कहा कि तुम शनी त्रयोदशी प्रदोष व्रत करो । तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे ।

तुमको एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति भी होगी । साधु महाराज ने नगर सेठ एवं उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया और दोनों पति पत्नी तीर्थयात्रा के लिए निकल दिए।  तीर्थ यात्रा पूरी करने के बाद वह अपने घर पर आए और विधि विधान से शनी त्रयोदशी व्रत किया और यह व्रत करने लगे । व्रत के प्रभाव से नगर सेठ के यहां एक सुंदर पुत्र ने जन्म दिया । इस तरह से जो भी व्यक्ति शनि त्रयोदशी व्रत करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।

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