तारा रानी की कथा tara rani ki katha in hindi

tara rani ki katha in hindi

दोस्तों आज हम आपको इस लेख के माध्यम से तारा रानी की कथा सुनाने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और इस आर्टिकल को पढ़कर तारा रानी की कथा को ध्यान से सुनते हैं ।

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कथा – एक राज्य में एक राजा रहता था । जिसका नाम स्पर्श था । वह राजा बहुत ही प्रतापी और दानी था । वह मां भगवती का सबसे प्रिय भक्त था । मां भगवती की पूजा करता था । उसके पास मां भगवती की कृपा से सब कुछ था । परंतु उसके कोई भी संतान नहीं थी । इस बात से राजा स्पर्श बड़ा दुखी रहता था । उसने माता भगवती से प्रार्थना की है मां तुम मुझे पुत्र का सुख प्रदान कर दो तो मेरी सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी ।

मां भगवती में राजा स्पर्श की बात स्वीकार कर ली थी । स्वप्न में राजा स्पर्श को मां भगवती ने दर्शन दिए और कहा कि तुम्हारे यहां मेरे आशीर्वाद से 2 कन्याओं का जन्म होगा । ऐसा कहकर मां भगवती वहां से अंतर्ध्यान हो गई थी । कुछ समय बीत जाने के बाद रानी के पेट में गर्भ ठहरा और एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया । जब राजा ने सुना कि उसके यहां एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया है तब वह खुशी के मारे झूम उठा था ।

उसने पूरे राज्य में घोषणा करवा दी थी कि सभी को इस खुशी में शामिल होने के लिए मैं  निमंत्रण दे रहा हूं । सभी लोग इस शुभ अवसर पर एकत्रित हो । सभी को भोजन, कपड़े दिए जाएंगे । इस तरह से उसने पहली कन्या के जन्म पर खूब उत्सव मनाया । राजा स्पर्श ने सभी ऋषि-मुनियों को घर पर बुलाया , खाना खिलाया था ।  राजा स्पर्श ने ज्योतिषियों को बुलवा कर लड़की की कुंडली बनवाई । जब ज्योतिषियों ने उस लड़की की कुंडली देखी तब वह राजा से कहने लगे कि यह लड़की बहुत ही भाग्यशाली है ।

इसका भाग्य बहुत अच्छा है । मां भगवती के आशीर्वाद से राजा स्पर्श के यहां दूसरी संतान  हुई और ज्योतिष को बुलाया । ज्योतिष ने जब दूसरी कन्या की कुंडली देखी तो वह आश्चर्यचकित रह गया ।  राजा से कहने लगा कि यह कन्या मनहूस है । यह कन्या जहां पर भी रहेगी वहां के हालात बहुत ही खराब हो जाएंगे । जिसके पास भी रहेगी उसका जीवन नष्ट हो जाएगा । ज्योतिषियों ने कुंडली के हिसाब से उस लड़की के पुनर्जन्म की कहानी सुनाई ।

राजा स्पर्श से कहा कि आपकी दोनों लड़की पूर्व जन्म में देव  इंद्र  की अप्सराएं थी । एक बार दोनों बहनों ने पृथ्वी पर आने का निश्चय किया और पृथ्वी पर आ गई । पृथ्वी पर आने के बाद दोनों बहनों ने एकादशी व्रत किया । दोनों बहनों के नाम , बड़ी बहन का नाम तारा था एवं छोटी लड़की  का नाम रुक्मण था । बड़ी बहन तारा ने छोटी बहन रुक्मण से कहा कि यह पैसे रख और बाजार से फल एवं पूजा का सामान ले आना । जैसे ही रुक्मण बाजार में गई उसे मछली के पकोड़े तले हुए दिखे ।

उसने उस पैसे से तले हुए पकोड़े ले लिए और खा लिए । फल एवं पूजा का सामान लेकर अपने घर पर वापस आ गई । उस रुक्मण ने अपनी बड़ी बहन को सारी बात बता दी । उसकी बड़ी बहन बहुत ही नाराज हुई और उसने अपनी छोटी बहन रुकमण को श्राप दे दिया । तारा ने रुक्मण से कहा कि तू कई तरह की योनियों में उलझी रहेगी । छिपकली का रूप धारण करके कीड़ा , मकोड़े खाएगी । इस तरह से अपनी बड़ी बहन से रुक्मण को श्राप मिला था ।

श्राफ के अनुसार रुक्मण ने एक छिपकली  का जन्म लिया । एक गुरु गोरख ऋषि थे। वह ऋषि जंगल में अपने शिष्यों के साथ रहते थे । कई शिष्य उनके साथ रहते थे । गुरु गोरख ऋषि के साथ एक घमंडी शिष्य भी रहता था । एक बार उस घमंडी शिष्य ने जल कमंडल हाथ में लिया और आश्रम के बाहर सुनसान इलाके में जाकर तपस्या करने लगा । जब वह शिष्य ध्यान में लीन हो गया था तब वहां से एक कपिला गाय निकल रही थी ।

कपिला गाय ने उस शिष्य के कमंडल से पूरा जल पी लिया । जब कपिला गाय उस कमंडल से अपना मुंह बाहर निकाल रही थी तब उस शिष्य की आंख खुल गई । उस शिष्य ने अपने चिमटे से उस कपिला गाय को मार मार कर अधमरा कर दिया था । जब ऋषि गुरु गोरख ने यह सुना की उनके शिष्य ने एक गाय को चिमटे से मारा है तब गुरु गोरख ऋषि वहां पर पहुंचे और शिष्य को भला बुरा कहा । उस  घमंडी शिष्य को आश्रम से बाहर निकाल दिया था ।

गुरु गोरख ऋषि बड़े चिंतित हुए क्योंकि उनके शिष्य ने गौ माता की हत्या कर दी थी । गोरख गुरु ने इस पाप से निजात पाने के लिए बहुत बड़ा यज्ञ किया था और उस यज्ञ में आसपास के सभी लोगों को बुलवाया था । जब उस घमंडी शिष्य ने यह सुना की गुरु गोरख जी एक यज्ञ करवा रहे हैं और उन्होंने सभी लोगों को भोजन पर आमंत्रित किया है तब उस घमंडी शिष्य ने गुरु गोरख जी से अपने अपमान का बदला लेने की बात सोची ।

यह सोचकर घमंडी शिष्य एक सांप का रूप धारण करके भंडारे में बनी हुई खीर में जा गिरा । उस दीवाल पर एक छिपकली चिपकी हुई थी । वह छिपकली रुकमण ही थी जिसे श्राफ प्राप्त था । उस छिपकली ने यह देखा कि इस खीर  में सांप जा गिरा है । यदि इस खीर को पूरी प्रजा ने खा ली तो सारी प्रजा मर जाएगी । उस छिपकली में मन ही मन विचार बना लिया की मैं इस खीर में गिर कर अपनी जान देकर इन सभी लोगों की जान बचाऊंगी ।

जैसे ही उस खीर को परोसने के लिए लोग वहां पर पहुंचे वह छिपकली उस खीर में जा गिरी । जब सभी लोगों ने यह देखा की खीर में छिपकली गिर गई है तब सभी ने पूरी खीर की उलट-पुलट कर दी । जब खीर जमीन पर फैला दी तब सभी को सांप दिखा और सभी ने छिपकली के त्याग को समझा । छिपकली का यह त्याग बहुत प्रशंसा जनक था । सभी लोग छिपकली को दुआ देने लगे और भगवान से प्रार्थना करने लगे की इस छिपकली को इसकी योनि से मुक्त कर दो और इसे एक इंसान का जीवन दे दो ।

सभी की प्रार्थना से रुक्मण छिपकली की योनि से मुक्त हो गई थी । इसके बाद यह कन्या आपके यहां पर जन्मी है । राजा स्पर्श के सलाहकार कहने लगे कि इस कन्या को आप मार दो नहीं तो यह आपके भाग्य को खोटा कर देगी लेकिन राजा स्पर्श  कहने लगा कि मैं किसी कन्या की हत्या नहीं कर सकता हूं । कुछ लोग राजा स्पर्श से कहने लगे की यदि तुम इस कन्या को मारना नहीं चाहते हो तो इस कन्या को एक बॉक्स में बंद करके हीरा , सोना , चांदी से लादकर समुद्र मैं फेंक दो ।

यह बॉक्स जिसको भी मिलेगा वह इस कन्या को पाल लेगा । राजा ने उस कन्या को बॉक्स में रखा और पानी में बहा दीया । वह बॉक्स बहते हुए नदी के किनारे पर पहुंचा । उस बक्से पर एक भंगी की नजर गई । उस भंगी ने उस बक्से को पानी से बाहर निकाला और खोलकर देखा तो उसमें एक छोटी सी बच्ची सो रही है । उस बच्ची को देखकर वह भंगी बड़ा खुश हुआ क्योंकि उस भंगी की कोई संतान नहीं थी । वह भंगी उस लड़की को लेकर अपनी पत्नी के पास गया और पत्नी की गोद में वह लड़की रख दी ।

इस तरह से उस लड़की का पालन-पोषण भंगी के द्वारा किया गया था । वह कन्या बड़ी हुई और उसका विवाह कर दिया था । उसकी बड़ी बहन तारा का भी राजा स्पर्श ने बड़े धूमधाम से अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र से विवाह कर दिया था । इस जन्म में तारा का नाम  तारामती रखा गया था । रुकमण की सास राजा हरिश्चंद्र के घर पर साफ सफाई का काम करती थी । एक बार रुकमण  की सास  की तबीयत खराब हो गई थी । रुकमण राजा हरिश्चंद्र के घर साफ सफाई के लिए चली गई थी ।

जब तारामती की नजर रुक्मण पर पड़ी तब उसने अपने पूर्व के अच्छे कर्मों के कारण रुक्मण को पहचान लिया था ।  तारामती ने रुक्मण को अपने पास बुलाया और अपने पास बैठने के लिए कहा । उस रुक्मण ने कहा कि तुम तो रानी हो मैं एक भंगी की संतान हूं मैं तुम्हारे पास में कैसे बैठ सकती हूं । उस तारामती रानी ने रुक्मण को सारी कहानी बता दी और रुक्मण से कहा कि यदि तुम इस श्राप से मुक्ति पाना चाहती हो तो मां भगवती की पूजा करो । वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए जाओ ।

तुम्हारी सभी मनोकामनाएं मां वैष्णो देवी पूरा करेंगी । इस तरह से रुक्मण मां भगवती से प्रार्थना करने लगी कि मेरे घर पर एक सुंदर पुत्र जन्म ले । मैं मां भगवती की प्रार्थना करूंगी और मां वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए जाऊंगी । मां वैष्णो देवी ने रुक्मण की प्रार्थना स्वीकार कर ली थी । मां वैष्णो देवी की कृपा से रुक्मण के घर पर एक सुंदर पुत्र ने जन्म लिया लेकिन रुकमणी मां वैष्णो देवी की पूजा करना भूल गई थी । जिस बात से मां वैष्णो देवी नाराज हो गई थी ।

जब रुक्मणी के पुत्र की उम्र 6 साल की हुई तब उस बच्चे को चेचक बीमारी लग गई थी । वह बीमारी कहीं पर भी ठीक नहीं हो रही थी । रुक्मण ने अपनी बड़ी बहन तारामती के पास जाने का फैसला लिया और वह अपनी बहन से मिलने के लिए चली गई । बहन से मिलने के बाद उसने अपनी बड़ी बहन को सारी कहानी बता दी ।

कहानी सुनने के बाद तारामती ने रुक्मण से कहा की तुमसे मां वैष्णो देवी की पूजा करने में कुछ कमी रह गई है जिसके कारण यह हुआ है । यह सुनकर रुक्मणी ने अपनी गलती को स्वीकार किया और मां भगवती की पूजा पूरे विधि-विधान से की । जिसके प्रभाव से उसका बच्चा ठीक हो गया था और मां भगवती की पूजा प्रतिदिन करने लगी थी ।

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