स्तंभेश्वर महादेव मंदिर जो गायब हो जाता है stambheshwar mahadev temple history in hindi
stambheshwar mahadev temple history in hindi
दोस्तों आज हम आपके लिए लाए हैं स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास जो दिन में दो बार गायब हो जाता है । चलिए अब हम पढ़ेंगे स्तंभेश्वर महादेव मंदिर के इतिहास को ।
स्तंभेश्वर महादेव का मंदिर भारतीय इतिहास में सबसे प्राचीन माना जाता है । इस मंदिर को देखने के लिए, इस मंदिर के शिवलिंग की पूजा करने के लिए देश विदेश के लोग आते हैं । यह मंदिर सबसे सुंदर दिखाई देता है । इस मंदिर के बारे में महाशिवपुराण में भी लिखा गया है ।
यह मंदिर दिन में दो बार गायब हो जाता है । इस मंदिर में जो भी भक्त दर्शन करने के लिए आता है वह मंदिर में भगवान शिव की आराधना करके अपने और अपने परिवार की खुशियों के लिए प्रार्थना करता है । स्तंभेश्वर महादेव मंदिर समुद्र के किनारे स्थित है ।
यहां समुद्र की लहरें बहुत तेज गति से हिलोरे मारती हैं । यहां पर पानी की तेज लहरें जब उठती हैं तब उस मंदिर में किसी भी व्यक्ति को नहीं जाने दिया जाता है ।
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स्तंभेश्वर महादेव का मंदिर गुजरात में स्थित है । जब हम गुजरात के बड़ोदरा में पहुंचकर वहां से 85 किलोमीटर दूर स्थित जंबूसर तहसील के कावी कंबोई गांव में पहुंचते हैं तो वहां पर स्तंभेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है । इस मंदिर का इतिहास बड़ा ही रोचक रहा है ।
कहा जाता है कि यह मंदिर दिन में दो बार गायब हो जाता है । यह मंदिर करीबन डेढ़ सौ साल पहले से स्थित है । इस मंदिर की खोज डेढ़ साल पहले की गई थी । इस मंदिर के चारों तरफ पानी दिखाई देता । यह मंदिर सबसे सुंदर दिखाई देता । इस मंदिर में प्राचीन समय से ही लोगों की आस्था रही है ।
इस मंदिर का वर्णन महाशिवपुराण में भी किया गया है । यह कहा जाता है कि यह मंदिर भगवान शिव जी के पुत्र कार्तिकेय ने बनवाया था । कुछ लोगों का यह कहना है कि यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है । जब समुद्र में तेज़ लहरें आती हैं तब समुद्र का पानी हिलोरे मारने लगता है ।
तेज पानी की हिलोरे आने के कारण यह मंदिर गायब हो जाता है । जब पानी की लहरें शांत हो जाती हैं तब यह मंदिर दोबारा से दिखाई देने लगता है । यह मंदिर पानी से डूब जाता है । जब तेज पानी की हिलोरे इस मंदिर पर आती हैं तो यह मंदिर पूरी तरह से जल मग्न हो जाता है ।
जब तेज पानी की लहरें आने का अनुमान होता है तब मंदिर के अंदर किसी भी व्यक्ति को नहीं जाने दिया जाता है । मंदिर में प्रवेश करने से पहले सभी भक्तों को एक पर्चा दिया जाता है उस पर्चे में तेज पानी की लहरों का अनुमान लिखा रहता है ।
जिस समय तेज पानी की लहरों का आगमन होता है उस समय सभी भक्त मंदिर में प्रवेश नहीं करते हैं । यह सभी व्यक्तियों की भलाई के लिए किया जाता है । यदि कोई व्यक्ति मंदिर में तेज पानी की लेहरों में फंस जाता है तो उसे बाहर निकालने के लिए भी व्यवस्था की गई है ।
stambheshwar mahadev darshan timings
स्तंभेश्वर महादेव का मंदिर दिन में दो बार जलमग्न हो जाता है । इस मंदिर में शिवलिंग के दर्शन दिन में एक बार ही होते है । दिन में सभी व्यक्ति एक साथ इस मंदिर के अंदर स्थित शिवलिंग के दर्शन करते हैं , भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं ।
जब यह मंदिर जल मग्न होने की स्थिति में होता है तब वहां से सभी भक्त मंदिर के बाहर चले जाते हैं । जब तेज पानी की लहरें इस मंदिर पर पड़ती हैं तो शिवलिंग पूरी तरह से पानी में डूब जाती है । कहां जाता है कि यह पानी महादेव शिवजी का जलाभिषेक करने के लिए आता है ।
यह मंदिर पूरी तरह से पानी से दूर हो जाता है । जब यह मंदिर पानी से डूब जाता है तब इस मंदिर के दर्शन के लिए किसी को भी जाने की अनुमति नहीं होती है । जो भक्त यहां पर मंदिर देखने के लिए आता है उसको एक पर्चा दिया जाता है उस पर्चे में तेज पानी की लहरें आने का समय लिखा होता है ।
जिस समय तेज पानी की लहरें आती हैं उस समय यहां पर किसी भी व्यक्ति को जाने नहीं दिया जाता है । यह सब लोगो की भलाई के लिए किया जाता है । इस मंदिर का इतिहास प्राचीन समय से ही प्रसिद्ध है । इस मंदिर के निर्माण के बारे में कुछ लोगों का कहना है कि यह मंदिर 200 साल पहले का है इस मंदिर के बारे में महाशिवपुराण में भी लिखा गया है ।
Stambheshwar Mahadev Story
इस मंदिर के बारे में यह कहा जाता है कि प्राचीन समय में ताड़कासुर राक्षस ने भगवान शिव की पूजा करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था और भगवान शिव ने ताड़कासुर से अपनी इच्छा के अनुसार वरदान मांगने के लिए कहा था ।
ताड़कासुर ने भगवान शिव से अमर होने का वरदान मांगा था और भगवान शिव ने उस राक्षस को वरदान देने से मना कर दिया था । दोबारा से ताड़कासुर ने भगवान शिव से कहा कि मुझे ऐसा वरदान दो कि मुझे सिर्फ आपका ही पुत्र मारे जिसकी उम्र 6 दिन की हो ।
भगवान शिव ने ताड़कासुर को यह वरदान दे दिया था । वरदान मिलने के बाद ताड़कासुर को घमंड हो गया था और वह सभी लोगो पर अत्याचार करने लगा था । पूरी सृष्टि पर हाहाकार मच गया था । ताड़कासुर के कुकर्म से देवी देवता भी परेशान हो गए थे तब सभी देवी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और भगवान शिव से कहा की हे प्रभु यह संसार संकट में हैं ।
यह ताड़कासुर पूरे संसार को नष्ट करने में लगा हुआ है । जब भगवान शिव ने यह सुना की ताड़कासुर लोगों को मार रहा है तब भगवान शिव के द्वारा श्वेत पर्वत के कुंड से कार्तिकेय का जन्म हुआ था । जब कार्तिकेय 6 दिन का हुआ तब कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध कर दिया था ।
जब कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर उनके पिता का परम भक्त था तब कार्तिकेय को बड़ा दुख हुआ था । कार्तिकेय को दुखी देखकर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा था की यहां पर तुम एक शिवलिंग की स्थापना करो और उनसे माफी की प्रार्थना करो तुमको भगवान शिव अवश्य माफ कर देंगे । तभी से यह तीर्थ स्तंभेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है ।
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