शांतिप्रिय द्विवेदी की आत्मकथा या जीवनी Shantipriy diwedi’s autobiography in hindi

shantipriy diwedi biography in hindi

Shantipriy diwedi’s  – दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल  के माध्यम से शांतिप्रिय द्विवेदी  के जीवन परिचय के बारे में बताने जा रहे हैं । तो चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और इस आर्टिकल को पढ़कर शांतिप्रिय द्विवेदी के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करते हैं ।

Shantipriy diwedi's autobiography in hindi
Shantipriy diwedi’s autobiography in hindi

shantipriy diwedi’s autobiography in hindi शांतिप्रिय द्विवेदी के जन्म व् परिवार के बारे में – शांतिप्रिय द्विवेदी जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार मे हुआ था । शांतिप्रिय द्विवेदी का जन्म भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य के काशी में 1996 को हुआ था । इनका परिवार एक निर्धन परिवार था । शांतिप्रिय द्विवेदी के पिता आजमगढ़ दिल्ली के पास में स्थित बरहमपुर गांव के रहने बाले थे । परंतु अपनी आर्थिक स्थिति से परेशान होकर शांतिप्रिय द्विवेदी के पिता के द्वारा आजमगढ़ के पास में स्थित बरहमपुर गांव को छोड़ दिया गया था और वह काशी में अपने परिवार के साथ में रहने लगे थे ।

शांतिप्रिय द्विवेदी के जीवन के बारे में – शांतिप्रिय द्विवेदी का जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था जिसके कारण उनको अपने शुरुआती दौर में गरीबी के कारण काफी परेशान होना पड़ा था । उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और वह अपनी गरीबी से काफी दुखी रहते थे । शांतिप्रिय द्विवेदी का जो स्वभाव था वह स्वभाव संवेदनशील और भावुक था । इसी कारण से उनको साहित्यकार बनने में रुचि थी । वह लेखक बनने के लिए मेहनत करने लगे थे । शांतिप्रिय द्विवेदी जब देश में गरीबी और शिक्षा के स्तर में कमी होते हुए देखते थे तब उनको काफी दुख होता था ।

देश के लोगों को शिक्षा की ओर बढ़ाने और देश के सभी लोगों की आर्थिक स्थिति व्यक्त करने के उद्देश्य शांतिप्रिय द्विवेदी के  द्वारा कई गद्य , निबंध और कविताएं लिखी गई है जिन सभी लेखों को पढ़कर मानव जीवन को सफलता प्राप्त करने का रास्ता प्राप्त होता है । इस तरह से शांतिप्रिय द्विवेदी लेख लिखते गए और कई यात्राएं शांतिप्रिय द्विवेदी के द्वारा की गई हैं । शांतिप्रिय द्विवेदी दुनिया के रहस्य को अपने लेख के माध्यम से सभी को बताएं के लिए यात्रा करते रहते थे । एक जगह पर स्थित रहकर वह रहना नहीं चाहते थे ।

वह देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए और देश के सभी नागरिकों को शिक्षा की ओर बढ़ाने के उद्देश्य निरंतर यात्रा करते गए और लेख लिखते गए थे । शांतिप्रिय द्विवेदी जी के द्वारा तकरीबन 27 कृतियां लिखी गई थी जिन कृतियों को पढ़ने के बाद मनुष्य जीवन में ज्ञान का उजाला होता है जिस उजाले से मनुष्य का जीवन सफलता की ओर बढ़ता है । शांतिप्रिय द्विवेदी जी के द्वारा जो 27 कृतियां लिखी गई है उन 27 कृतियों में उनकी सबसे सफल कृतियों के नाम इस प्रकार से हैं हमारे साहित्य निर्माता , युग , धरातल ,  कवि और काव्य ,  चित्र और चिंतन ,  वृंत और विकास ,  साहित्य सामयिकी , जीवन यात्रा ,  परिव्राजक की प्रजा , स्मृतियां और कृतियां , परिक्रमा ,  हिमानी ,  परिचय , नीरव आदि ।

इस तरह से शांतिप्रिय द्विवेदी की यह प्रमुख कृतियां हैं जो सबसे सफल हैं । शांतिप्रिय द्विवेदी जी शुक्ल युग के प्रमुख गद्य लेखक के रूप में पहचाने जाते हैं । शुक्ल युग मे शांतिप्रिय द्विवेदी के द्वारा कई गद्य लिखे गए हैं । जो काफी सुंदर और अद्भुत हैं जिन गद्यो को पढ़ने के बाद जीवन का सार समझ में आता है । इसीलिए शांतिप्रिय द्विवेदी को शुक्ल युग का प्रमुख गद्य कार कहा गया है । भारतेंदु युग के बाद द्विवेदी युग का आरंभ हुआ था जिसके बाद कई महान साहित्यकारों के द्वारा हिंदी साहित्य में बदलाव किए गए थे ।

शांतिप्रिय द्विवेदी जी के द्वारा कई भावुक लेख भी लिखे गए हैं जिन लेखों को पढ़ने के बाद आनंद प्राप्त होता है ।इस तरह से शांतिप्रिय द्विवेदी ने अपने जीवन में कई निबंध , लेख , गद्य , कविताएं लिखकर अपना जीवन जिया है ।जब शांतिप्रिय द्विवेदी जी को उदर के मर्मान्तक जैसी घातक बीमारी ने जकड़ लिया था तब वह काफी बीमार रहने लगे थे । परंतु वह बीमारी से काफी लड़ते रहे , उन्होंने बीमारी से लड़ते हुए कई लेख लिखे हैं जिन लेखों को पढ़ने के बाद आनंद प्राप्त होता है । जब उनकी बीमारी बढ़ती गई तब डॉक्टरों के द्वारा यह कह दिया गया था कि शांतिप्रिय द्विवेदी अब कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । इनकी बीमारी को ठीक नहीं किया जा सकता हैं ।

अब इनकी जितनी जिंदगी है वह जिंदगी कुछ ही दिनों की बची हुई हैं । इसके बाद बीमारी से लढ़ते हुएं  उन्होंने कुछ समय तक अपना जीवन व्यतीत किया । परंतु उनकी बीमारी लास्ट स्टेज पर पहुंच गई थी और 27 अगस्त 1967 को हमारे देश के महान साहित्यकार , गद्य कार , निबंधकार  शांतिप्रिय द्विवेदी जी का निधन  हो गया था ।

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