नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास nalanda vishwavidyalaya history in hindi

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नालंदा विश्वविद्यालय बिहार के नालंदा जिले में स्थित है ।बिहार की राजधानी पटना से लगभग 88 किलो मीटर बिहार के प्रमुख तीर्थ स्थान राजगीर से 13 किलोमीटर की दूरी पर बड़ा गांव के पास नालंदा विश्वविद्यालय स्थित है । नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास कई सालों पुराना है । यह कहा जाता है कि आज से ढाई हजार साल पहले एशिया में तीन विश्वविद्यालय थे ।

पहला विद्यालय विक्रमशिला , दूसरा विद्यालय नालंदा , तीसरा विद्यालय तक्षशिला आदि । भारत की आजादी के बाद जब पाकिस्तान को अलग किया गया था तब तक्षशिला पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था । विक्रमशिला और नालंदा भारत में स्थित हैं । नालंदा विश्वविद्यालय बिहार में स्थित है ।

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यह कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाती थी । यहां से प्राचीन समय में बड़े-बड़े विद्वानों ने शिक्षा ग्रहण की थी । यहां से कई विद्वान शिक्षा लेकर विदेशों में ज्ञान की गंगा लेकर गए थे । प्राचीन समय में नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के लिए कोरिया , चीन , जापान , श्रीलंका , मंगोलिया , तिब्बत आदि देशों के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे ।यह कहा जाता है कि पांचवी शताब्दी के आरंभ से 700 वर्ष तक नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाती थी ।

यहां से बड़े बड़े ज्ञानियों ने शिक्षा प्राप्त करके अपने जीवन को सफल बनाया था । यह कहा जाता है कि प्राचीन समय में चीन के सबसे महान यात्री हवांग यांग ने भी  यहां से शिक्षा प्राप्त की थी । चीन के हवांग यांग यहां पर 5 साल तक रुके थे । हवांग यांग से ही यह पता चला था कि नालंदा विश्वविद्यालय के छात्रों को भिक्षा मांगने की जरूरत नहीं पड़ती थी क्योंकि आसपास के गांव से घी , दूध , अनाज , फल , सब्जियां , चावल एवं कपड़े आ जाते थे ।

नालंदा विश्वविद्यालय से करीबन 1500 आचार्य और 10000 विद्यार्थियों ने शिक्षा प्राप्त कर ली थी । यह कहा जाता है कि भगवान बुद्ध भी यहां पर आते रहते थे और भगवान बुद्ध के 2 सबसे बड़े शिष्य सरिपुत्र और मार्दगलापन ने नालंदा में ही जन्म लिया था । यही पर भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों  को ज्ञान दिया था । यह कहा जाता है कि महावीर स्वामी जी यहां पर आए थे और करीबन 14 वर्ष तक नालंदा विश्वविद्यालय में रहे थे ।

यह कहा जाता है कि प्राचीन समय में सम्राट अशोक ने नालंदा विश्वविद्यालय के अंदर एक मंदिर भी बनवाया था जिस कारण से नालंदा विश्वविद्यालय और बिहार अशोक सम्राट के नाम से प्रसिद्ध हुआ था और अशोक सम्राट को बिहार नालंदा का संस्थापक माना जाने लगा था । प्राचीन समय में 1205 में नालंदा विश्वविद्यालय पर मोहम्मद बख्तियार खिलजी ने आक्रमण कर दिया और नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया था ।

जब नालंदा विश्वविद्यालय टूट, फूट गया था तब कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने नालंदा विश्वविद्यालय को पुनः निर्माण कराने के लिए काफी धन दिया था । यह भी कहा जाता है कि कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने कई गांव नालंदा विश्वविद्यालय के नाम कर दिए थे और उन्हीं गांव से विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए खाने पीने का सामान आता था । जिस समय नालंदा विद्यालय को नष्ट किया गया था उस समय कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के साथ साथ मुदित मुद्रा नाम के एक व्यक्ति ने भी नालंदा विश्वविद्यालय के पुनः निर्माण के लिए धन दिया था ।

पुनः निर्माण हो जाने के बाद ऐसा कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में रुकने के लिए दो ब्राह्मण आए हुए थे  तब नालंदा विश्वविद्यालय के किसी विद्यार्थी ने जूठन और गंदा पानी उन साधुओं के ऊपर डाल दिया था । उन साधुओं ने सूर्य भगवान की तपस्या करने के बाद मोटे मोटे अंगारे नालंदा विश्वविद्यालय के ऊपर फेंक दिए थे जिससे नालंदा विश्वविद्यालय पूरी तरह से जल चुका था । नालंदा विश्वविद्यालय 7 मील लंबी और 3 मील चौडी भूमि में फैला हुआ था लेकिन इसकी एक वर्ग मील तक ही खुदाई की गई  है ।

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