मीराबाई पर निबंध meera bai essay in hindi

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हमारे ग्रंथों के अनुसार मीराबाई कृष्ण भगवान की प्रिय भक्त थी, मीरा बाई का जन्म 1498 मैं राजस्थान के एक ग्राम में हुआ था । कहते हैं कि जब मीराबाई छोटी थी तब वह भगवान की मूर्ति से बहुत प्रेम करती थी धीरे धीरे वह बड़ी होने लगी और कृष्ण भगवान की मूर्ति से प्रेम करने लगी और उन्होंने अपने सीने से लगाकर प्रेम गीत गाकर अपने मन में कृष्ण भगवान को बसा लिया , वो कृष्ण भगवान को अपने पति के रूप में देखने लगी और मीरा बाई ने अपना पूरा जीवन कृष्ण भक्ति में ही बिता दिया ।

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मीरा बाई के जीवन में कई तरह के कष्ट आए फिर भी उन्होंने कृष्ण भक्ति के रंग में रंगना बंद नहीं किया वह दिन प्रतिदिन कृष्ण रंग में रंगती चली गई । जब मीराबाई का भोजराज से विवाह हुआ तो उनकी अल्पायु में ही मृत्यु हो गई और फिर मीराबाई एक बैरागी का जीवन जीने लगी । मीराबाई के जीवन में ऐसी कई कठिनाइयां आई और उन्होंने उन कठिनाइयों का सामना किया ।

समाज के कई व्यक्तियों ने उन पर कई आरोप भी लगाये लेकिन उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मन में ही पति मानकर अपना पूरा जीवन बिता दिया । मीराबाई ने अपने जीवन में कई संघर्ष किए और कई साधना , तपस्या की फिर 1546 के आसपास मीराबाई का देहांत हो गया और तभी से उनको कृष्ण भगवान की प्रथम भक्त के रूप में हम सभी जानने लगे ।

मीराबाई का यह प्रेम अमर प्रेम था वह कृष्ण भगवान की मूर्ति के सामने कीर्तन करके नाचकर कृष्ण भगवान की आराधना करके कृष्ण भगवान के प्रेम रंग में रंग जाती थी । मीराबाई के इस प्रेम से उनका भाई भी उनको पसंद नहीं करता था और उनको कई बार मारने की भी कोशिश की गई । उनके भाई के साथ साथ उनके पड़ोसियों ने भी उनको प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था तब मीराबाई इन सभी से तंग आकर  वृंदावन चली गई और वहां पर अपना जीवन व्यतीत करने लगी ।

मीराबाई के मन में सिर्फ कृष्ण भगवान की मूर्ति बसी हुई थी वह कृष्ण भगवान के दर्शन करना चाहती थी और उनका मन हमेशा कृष्ण रंग में रंगा रहता था मानो ऐसा लगता था कि उन्होंने अपना पूरा जीवन कृष्ण भगवान के ऊपर समर्पित कर दिया हो । कृष्ण भगवान के अलावा उनको कुछ भी दिखाई नहीं देता था उनको संसार की सुख सुविधाओं से कुछ भी मतलब नहीं था । जब मीराबाई कृष्ण भक्ति के रंग में रंग जाती थी और जब कृष्ण जी की मूर्ति के सामने कीर्तन करती थी और नाचती थी तो कई लोग उनके इस कीर्तन का आनंद लेने के लिए आते थे ।

मीराबाई ने सिर्फ कृष्ण भक्ति को अपनाया और कृष्ण भगवान को पाने की इच्छा उनके मन में थी वह कृष्ण भक्ति में पूरी तरह से लीन होकर अपना जीवन व्यतीत करने लगी । कहते हैं की मीराबाई का सिर्फ एक ही सपना था कि वह किसी भी तरह से कृष्ण भगवान को अपना बना सकें और कृष्ण जी की भक्ति में अपना जीवन व्यतीत कर सकें.

जब उनकी मृत्यु हुई तब कुछ लोग कहते थे कि वह कृष्ण भगवान में ही समा गई. एक पंक्ति में कहा गया है कि मीरा के प्रभु गिरिधर नागर कहने का अर्थ यह है कि मीरा के तो सिर्फ एक ही प्रभु है और वो हैं श्री कृष्ण । मीरा जी जिस तरह से कृष्ण जी से प्रेम करती थी उस तरह का प्रेम आज तक किसी ने श्री कृष्ण जी से नहीं किया, मीरा जी ने अपना सारा जीवन श्री कृष्ण भक्ति में लगा दिया ।

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