लाडी शाह हिस्ट्री इन हिंदी History of sai laddi shah ji in hindi

Laddi shah history in hindi

Laddi shah ji – दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से लाडी शाह के बारे में बताने जा रहे हैं । जो एक सूफी फकीर थे । जिन्होंने अपना जीवन दूसरों की भलाई के लिए निछावर कर दिया था । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और लाडी शाह जी के बारे में , बाबा साईं जी के बारे में जानते हैं ।

History of sai laddi shah ji in hindi
History of sai laddi shah ji in hindi

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बाबा लाडी शाह का जन्म स्थान एवं उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में – बाबा लाडी शाह का जन्म नकोदर शहर में हुआ था । जिस नकोदर शहर को आज पीरों एवं फकीरों की धरती के नाम से सभी जानते हैं । नकोदर का शाब्दिक अर्थ होता है इस जैसा ना कोई दर । नकोदर में कई फकीरों ने जन्म लिया है और उन्होंने अपना सारा जीवन दूसरों की भलाई में लगाया है । इसीलिए इस जगह का नाम नकोदर रखा गया था । बाबा लाडी शाह का नाम बाबा साईं था ।

बाबा साईं का नाम बाबा लाडी शाह उनके गुरु , उनके आदर्श , उनके परमात्मा बाबा मुराद शाह जी ने रखा था । बाबा मुराद शाह उनके हौसले एवं उनकी सोच से खुश थे । जब बाबा साईं की मुलाकात बाबा मुराद शाह से हुई तब बाबा साईं के विचारों में परिवर्तन आया और वह बाबा मुराद शाह जी से ज्ञान प्रद बातें सीखने लगे थे । जब बाबा मुराद शाह उनको ज्ञान प्रद बातें कहते थे तब बाबा साईं को बहुत अच्छा लगता था । बाबा साईं ने अपना प्रारंभिक जीवन बहुत ही शांत माहौल में बिताया था ।

जब बाबा साईं की मुलाकात बाबा मुराद शाह से हुई तब उन्होंने नेकी के रास्ते पर चलने का फैसला कर लिया था । बाबा साईं ने बाबा मुराद शाह से ज्ञान प्राप्त करने का फैसला कर लिया था । बाबा साईं बाबा मुराद शाह के बहुत करीब थे और बाबा मुराद शाह अपने प्रिय शिष्य बाबा साईं से बहुत प्रेम करते थे । जब बाबा साईं को बाबा मुराद शाह से ज्ञान प्राप्त करना होता था तब बाबा साईं बाबा मुराद शाह के चरणों में जा करके बैठ जाते थे । जब बाबा मुराद शाह जी की सभा लगती थी तब उस सभा में कई लोग आकर के बैठते थे ।

उस सभा में बाबा साईं जी भी बाबा मुराद शाह के पैरों में जा करके बैठ जाते थे क्योंकि बाबा साईं को बाबा मुराद शाह की बातों से बहुत ही आनंद आता था ।

बाबा साईं का नाम बाबा लाडी शाह बाबा मुराद शाह जी के द्वारा रखा गया था इसके पीछे क्या घटना थी इसके बारे में अब हम जानेंगे – एक बार बाबा मुराद शाह जी ने अपने समस्त शिष्यों की परीक्षा लेने का निर्णय लिया था । बाबा मुराद शाह जी ने सबसे पहले उनके शिष्य मोहन को अपने पास बुलाया और मोहन के साथ अपना ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करने लगे थे । बाबा मुराद शाह ने एक 30 फुट गहरा कुआं खुदवाया था और उस कुए के अंदर बैठने की व्यवस्था करवाई थी । जब 30 फुट गहरा कुआं बनकर तैयार हो गया था तब बाबा मुराद शाह ने मोहन को अपने पास बुलाया था ।

जब मोहन बाबा मुराद शाह के पास आया तब बाबा मुराद शाह ने मोहन से कहा की तुम्हें इस कुए के अंदर बैठना है ।  जब तुम इस कुएं के अंदर बैठ जाओगे तब इस कुएं को ऊपर से ढक दिया जाएगा । यह सुनकर मोहन हैरान परेशान हो गया था क्योंकि मोहन को पहले से ही यह सब करने से डर लगता था । जब बाबा मुराद शाह जी ने मोहन से कुए के अंदर बैठने के लिए कहा तब मोहन ने बाबा मुराद शाह जी को मना कर दिया था ।

जब मोहन ने बाबा मुराद शाह जी को कुए के अंदर बैठने से मना कर दिया था तब बाबा मुराद शाह जी ने बाबा साईं जी को अपने पास बुलाया था । बाबा मुराद शाह जी ने बाबा साईं को कुए के अंदर बैठने के लिए कहा था और बाबा साईं ने बाबा मुराद शाह जी की आज्ञा को माना और वह कुए के अंदर जाकर बैठ गए थे । उस कुए के बीच में बाबा मुराद शाह भी बैठ गए थे । इसके बाद उस कुए को ऊपर से ढक दिया गया था ।

कई दिनों तक बाबा मुराद शाह एवं बाबा साईं जी उस कुए के अंदर बैठे रहे थे । कुछ दिनों के बाद बाबा मुराद शाह जी बाबा साईं जी को कुएं से बाहर लेकर के आए थे । इसके बाद बाबा मुराद शाह जी ने अपने सारे कार्य बाबा साईं जी को सौंप दिए थे । इसके बाद बाबा मुराद शाह जी दोबारा कुए के अंदर जाकर बैठ गए थे और उसी कुएं में वह भगवान की आराधना करते रहते थे । कई समय बीत जाने के बाद बाबा मुराद शाह उस कुएं से बाहर निकले और बाहर निकलने के बाद वह अपना अधिकतर समय बाबा साईं के साथ व्यतीत करने लगे थे ।

बाबा मुराद शाह ने एक उर्स लगाने का फैसला किया और उस उर्स में जाने-माने कव्वाल मलेरकोटला के बेहतरीन कव्वाल करामात अली एंड कंपनी को कव्वाली का आयोजन करने के लिए बाबा मुराद शाह के द्वारा बुलाया गया था ।  बाबा मुराद शाह ने कव्वाली का आयोजन किया था । कव्वाली में काफी लोग दूर-दूर से आए थे । बाबा मुराद शाह जी मस्ती में झूम उठे थे । बाबा ने मस्ती ही मस्ती में बाबा साईं से कहा कि दुनिया में एक ही शेर होता है और घुंघरू बाबा साईं को देकर बाबा साईं से कहा की लाडी शाह इधर आओ ।

बाबा मुराद शाह ने बाबा साईं से कहा कि तुम आज से मुर्शद बाबा मुराद शाह की जगह पर बैठकर असहाय लोगों की मदद करोगे । इसके बाद बाबा मुराद शाह वापस कुए के अंदर जाकर भगवान की भक्ति में लीन हो गए थे । बाबा लाडी शाह ने बाबा मुराद शाह का पूरा काम अपने हाथों में ले लिया था । वह लोगों की भलाई के लिए कार्य करने लगे थे ।

बाबा साईं उर्फ बाबा लाडी शाह के द्वारा उनके परम सम्मानीय गुरु मुराद शाह जी के नाम पर डेरे का निर्माण – बाबा लाडी शाह एक चमत्कारी एवं लोगों की सहायता करने वाले गुरु बन गए थे । जिस तरह से बाबा मुराद शाह जी अपने शिष्यों को ज्ञान दिया करते थे उसी तरह से बाबा लाडी शाह जी भी कई शिष्यों को शिक्षा देते थे । बाबा लाडी शाह ने बाबा मुराद शाह जी के नाम पर एक डेरा बनवाया था और बाबा साईं उर्फ बाबा लाडी शाह भी वहीं पर अपने शिष्यों के साथ जीवन व्यतीत करने लगे थे । जब बाबा लाडी शाह के हाथों में बाबा मुराद शाह के द्वारा जिम्मेदारियां सौंपी गई तब बाबा लाडी शाह ने सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया था ।

वह निरंतर लोगों की भलाई के लिए कार्य करते रहते थे । जब भी किसी असहाय व्यक्ति को बाबा साईं देखते थे तब उनके अंदर दया भाव की भावना जागृत हो जाती थी और वह उस व्यक्ति की पूरी तरह से मदद किया करते थे । बाबा साईं उर्फ बाबा लाडी शाह के द्वारा कई भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाया गया था । बाबा लाडी शाह के इस काम की सराहना हम सभी को दिल से करना चाहिए क्योंकि बाबा लाडी शाह ने अपने पूरे जीवन को लोगों की भलाई के लिए लगा दीया था ।

बाबा लाडी शाह के फकीर बनने के बारे में – जब अपने प्रारंभिक जीवन काल से बाबा साईं जी बड़े होने लगे थे तब वह दुनिया में कई परेशान लोगों से मिले । उनकी परेशानियां देखते हुए उनको बहुत बुरा लगा और दुनिया की परेशानियों से वह परेशान होने लगे थे । बाबा लाडी शाह की उम्र जब 24 साल की थी तब बाबा लाडी शाह ने अपना पूरा जीवन फकीर बनकर बिताने का निश्चय किया था । जब बाबा लाडी शाह की मुलाकात बाबा मुराद शाह जी से हुई तब उन्होंने अपनी 28 की उम्र में फकीर बनने बनने का पूर्णता निश्चय कर लिया था ।

अपना पूरा जीवन बाबा मुराद शाह जी के चरणों में बिताने का निश्चय कर लिया था । जब वह बाबा मुराद शाह जी की ज्ञान प्रद बातें सुनते थे तब उनको बड़ा ही आनंद आता था । वह बाबा मुराद शाह जी के सबसे करीबी शिष्यों में जाने जाते थे ।बाबा मुराद शाह जी के द्वारा ली गई परीक्षा में बाबा साईं जी पास हुए थे और बाबा साईं को अपने से भी ज्यादा अपने गुरु मुराद शाह जी पर पूर्ण रूप से भरोसा था । बाबा मुराद शाह जी  बाबा लाडी शाह से जो भी कहते हैं उस बात को बिना परिणाम जाने स्वीकार कर लेते थे । क्योंकि बाबा साईं को यह पता था कि कोई भी गुरु अपने शिष्य को गलत रास्ता नहीं दिखाता ।

यदि गुरु शिष्य की परीक्षा लेता है तो उसमें शिष्य का ही फायदा होता है । गुरु के द्वारा शिष्य की परीक्षा लेने पर शिष्य की काबिलियत के बारे में पता चलता है ।

बाबा मुराद शाह जी के बाद बाबा लाडी शाह के द्वारा किए गए कार्य – जब बाबा मुराद शाह जी अपने डेरे का पूरा काम बाबा लाडी शाह के हाथों में सौंप कर चले गए थे तब बाबा लाडी शाह ने पूरी जिम्मेदारियां निभाई थी । सबसे पहले बाबा लाडी शाह ने मुराद शाह जी के नाम पर एक डेरे का निर्माण करवाया था । उसी डेरे में बाबा लाडी शाह अपने शिष्यों को ज्ञान प्रद शिक्षा देते थे । इसके बाद बाबा लाडी शाह ने बाबा मुराद शाह की स्मृति में वार्षिक उर्स मेले का आयोजन करने का फैसला किया था और उस मेले में जाने-माने कव्वाल और मुराद शाह जी के सबसे प्रिय कव्वाल मलेरकोटला के बेहतरीन कव्वाल करामात अली एंड पार्टी को बुलाया गया था ।

इस तरह से बाबा लाडी शाह ने बाबा मुराद शाह जी की स्मृति में मेला लगाने का फैसला किया था और उस मेले में कव्वालो के साथ-साथ गायक कलाकारों को भी बुलाया गया था । उस मेले में सूफी पंजाबी गायकों को भी प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रित बाबा लाडी शाह के द्वारा किया गया था क्योंकि बाबा मुराद शाह जी को उर्स के मेले में बहुत ही आनंद आता था । वह मेले में कव्वालियां सुनकर प्रसन्न होते थे ।इसी लिए बाबा लाडी शाह ने उनकी याद में यह उर्स मेला लगाने का निर्णय लिया था ।

बाबा लाडी शाह के परम शिष्य गुरदास मान के बारे में – बाबा गुरदास मान बाबा लाडी शाह के परम शिष्य में पहचाने जाते है । गुरदास मान के बारे में ऐसा कहा जाता है कि पहले यह डफला बजाकर चारों तरफ घूमते रहते थे । एक बार बाबा साईं उर्फ बाबा लाडी शाह की सभा लगी हुई थी । उस सभा में बाबा लाडी शाह के पास पूरणा शाह कोटी जी एवं सुरिंदर शिंदा जी बैठे हुए थे । बाबा लाडी शाह को अचानक से ही गुरदास मान के बारे में ख्याल आया था ।

बाबा लाडी शाह ने सुरिंदर शिंदा जी से कहा कि वह लड़का जो चारों तरफ डफला बजा कर इधर-उधर भटकता रहता है उसको तुम जानते हो क्या ?  यह सुनकर सुरिंदर शिंदा जीने बाबा लाडी शाह से कहा कि हां में उसे जानता हूं । तब बाबा लाडी शाह ने सुरिंदर शिंदा जी से कहा कि उस नौजवान से कहना कि तुम्हारा कोई बेसब्री से इंतजार कर रहा है । उस नौजवान से जा करके कहना कि तू सारी दुनिया में डफली बजा कर घूम रहा है ।

वह एक ऐसी जगह भी है जहां पर तेरा काफी समय से इंतजार हो रहा है । एक समय की बात है जब 1982 में सुरिंदर शिंदा जी एक फिल्म की शूटिंग में काम कर रहे थे तब उनकी मुलाकात गुरदास मान से हुई थी । सुरिंदर शिंदा ने गुरदास मान को अपने पास बुलाया और गुरदास मान से कहा कि आपको हमारे बाबा साईं ने याद किया है ।  वह तुमसे मिलना चाहते हैं । बाबा लाडी शाह ने सुरिंदर शिंदा से जो कहा था वह सब सुरिंदर शिंदा ने गुरदास मान से कह दिया था ।

यह सुनने की बात गुरदास मान ने यह जवाब दिया की यदि उनकी यह इच्छा है तो में उनके बुलाने पर अवश्य उनसे मिलने के लिए जाऊंगा । एक बार जब रात के समय में गुरदास मान को एक सपना आया था । उस सपने में गुरदास मान ने बाबा लाडी शाह का डेरा देखा था ।  जब गुरदास मान ने सपने में बाबा लाडी शाह का डेरा देखा तब गुरदास मान  सुबह उठकर सुरिंदर शिंदा से मिलने के लिए चला गया था ।  गुरदास मान ने सुरिंदर शिंदा को सपने के बारे में बताया था ।

सुरिंदर शिंदा गुरदास मान को बाबा लाडी शाह के पास ले गया था । रास्ते में सुरिंदर शिंदा ने गुरदास मान से कहा कि हमारे बाबा लाडी शाह बहुत ही ज्ञानी हैं । यदि बाबा लाडी शाह तुमको कुछ दे तो तुम मना मत करना । जब गुरदास मान बाबा लाडी शाह के डेरे पर पहुंचे तब गुरदास मान ने कहा कि यह डेरा तो मैंने सपने में देखा था । इसके बाद गुरदास मान बाबा लाडी शाह से मिले और बाबा लाडी शाह में गुरदास मान को अपना परम शिष्य मान लिया था ।

जिस तरह से बाबा लाडी शाह को बाबा मुराद शाह से शिक्षा प्राप्त हुई थी उसी तरह से बाबा लाडी शाह ने गुरदास मान को शिक्षा दी थी ।

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