जम्मू और कश्मीर का 1947 के पहले एवं बाद का इतिहास History of jammu and kashmir in hindi

History of jammu and kashmir in hindi

दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से जम्मू और कश्मीर इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और जम्मू और कश्मीर के इतिहास को गहराई से जानते हैं ।

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जम्मू और कश्मीर का 1947 के पहले का इतिहास history of jammu and kashmir before 1947 in hindi

हमारा भारत देश जब ब्रिटिश शासन के अधीन था तब अंग्रेजो के द्वारा कई राज्यों पर कब्जा किया गया था । उसी तरह का एक राज्य था जिसका नाम था जम्मू और कश्मीर । जम्मू कश्मीर पर कई राजाओं का आधिपत्य रहा है । जम्मू कश्मीर एक बहुत बड़ा राज्य है । इस राज्य में कई बड़े-बड़े क्षेत्र शामिल हैं । उन क्षेत्रों के नाम लद्दाख ,  जम्मू , गिलगिट , कश्मीर , बालटिस्तान हैं । इन सभी क्षेत्रों को जम्मू कश्मीर में मिलाने का श्रय डोंगरा शासक को जाता है ।

1830 के दशक में डोंगरा शासक के राजाओं का यहां पर शासन था । डोंगरा शासक जम्मू में शासन किया करते थे । 1830 में सबसे पहले डोंगरा शासक ने लद्दाख पर हमला किया और वहां के राजा को हराकर लद्दाख को अपने कब्जे में ले लिया था । लद्दाख को अपने कब्जे में लेने के बाद जम्मू डोंगरा शासको ने लद्दाख को जम्मू का हिस्सा बना लिया था । इसके बाद डोंगरा शासकों ने अंग्रेजों से कश्मीर घाटी को भी छीन लिया था और कश्मीर घाटी को अपना बना लिया था । कश्मीर घाटी को जीतने के बाद गिलगिट को भी जम्मू कश्मीर में मिला लिया था ।

जम्मू कश्मीर पर राजा हरि सिंह का आधिपत्य – जम्मू और कश्मीर पर कई राजाओं ने अपना राज चलाया था ।1925 के दौरान राजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर की राजगद्दी संभाली थी और पूरा राज उन्हीं के इशारों पर चलने लगा था।  धीरे-धीरे समय बीतता गया और जम्मू कश्मीर के ही एक राजनेता शेख अब्दुल्लाह ने जम्मू कश्मीर में राजाशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था ।जब शेख अब्दुल्ला ने राजाशाही के खिलाफ आवाज उठाई तब राजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला दोनों के बीच दुश्मनी हो गई थी ।

जम्मू कश्मीर के शेख अब्दुल्ला – जम्मू कश्मीर में ही जन्मे शेख अब्दुल्ला ने अपनी पढ़ाई पूरी की , ग्रेजुएशन पूरा किया । इसके बाद वह नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे थे लेकिन जम्मू-कश्मीर में हिंदू राजा का शासन था । इसी कारण से उनको नौकरी नहीं मिल सकी थी । शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह के खिलाफ जंग छेड़ दी और वहां के राजाशाही शासन के खिलाफ आंदोलन कर दिया था ।

शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के कुछ लोगों को साथ मिलाकर एक राजनीतिक पार्टी का गठन भी किया था । 1932 को शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में ऑल जम्मू कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन किया था । इस पार्टी की सहायता से शेख अब्दुल्लाह वहां पर रह रहे मुस्लिमों की आवाज को उठाते थे । कुछ समय बाद ऑल जम्मू कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस को नेशनल कांफ्रेंस में बदल दिया गया था । इस पार्टी में मुस्लिम धर्म के लोगों केेे साथ साथ हिंदू धर्म एवं कई और धर्म के लोग भी शामिल थे ।

भारत की आजादी की खबर के बाद जम्मू कश्मीर की स्थिति – जब ब्रिटिश शासन के द्वारा भारत को आजाद करने की खबर आई तब जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह की चिंताएं बढ़ने लगी थी क्योंकि जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह जम्मू कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे । जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह जम्मू कश्मीर राज्य को ऐसा दर्जा देना चाहते थे की जम्मू कश्मीर राज्य पर किसी भी देश का शासन ना हो ।

जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह ने अपने राज्य के प्रधानमंत्री एवं उप प्रधानमंत्री के द्वारा यह खबर भी भेजी थी कि जम्मू-कश्मीर किसी भी देश के अधीन नहीं रहना चाहता है । जम्मू-कश्मीर अपने फैसले खुद ले सकता है किसी भी तरह की कोई भी दखलंदाजी जम्मू कश्मीर में नहीं की जाए ।

जम्मू कश्मीर में लार्ड माउंटबेटन – जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह को ब्रिटिश शासन के सबसे बड़े अधिकारी लॉर्ड माउंटबेटन के द्वारा जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राज्य बनाने का वादा किया गया था । जम्मू कश्मीर के लोगों को उनकी स्वतंत्रता का अधिकार दिया जाएगा , वहां के राजा को वहां की प्रजा के हित में काम करने के अधिकार भी दिए जाएंगे । लॉर्ड माउंटबेटन ने हरि सिंह से  वायदा किया था कि जम्मू कश्मीर को पूरी तरह से स्वतंत्र राज्य बनाया जाएगा जम्मू कश्मीर  पर भारत का एवं किसी भी देश का शासन लागू नहीं होगा ।

1947 के बाद जम्मू और कश्मीर का इतिहास

1947 के बाद का इतिहास

जब ब्रिटिश शासन के द्वारा भारत को आजाद कर दिया गया था । इसके बाद भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था । भारत का पहला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को चुना गया था । भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद सबसे बड़ा विवाद जम्मू और कश्मीर का दोनों देशों के बीच में हुआ ।इस विवाद का किसी भी तरह से हल नहीं निकल रहा था । वहां के राजा हरि सिंह जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राज्य के रूप में देखना चाहते थे ।

कई तरह की कोशिश जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की वहां के लोगों ने की थी लेकिन राजा हरि सिंह यह जानते थे कि यदि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान में मिल गया तो जम्मू कश्मीर के हिंदुओं का आधिपत्य खत्म हो जाएगा । इसलिए राजा हरि सिंह ने जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में विलय करने से मना कर दिया था । भारत की ओर से भी कई कोशिश की गई थी कि राजा हरि सिंह जम्मू कश्मीर राज्य को भारत में मिला दें । उस समय कांग्रेस की सरकार थी और राजा हरि सिंह कांग्रेस के शासन से खुश नहीं थे ।

जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह ने जम्मूूू कश्मीर को भारत में भी विलय  करने से मना कर दिया था । समय गुजरने के बाद , पाकिस्तान को अलग करने के बाद महात्मा गांधी और लॉर्ड माउंटबेटन जम्मू-कश्मीर गए और वहां के राजा हरि सिंह से मिले । राजा हरि सिंह को भारत की तरफ से यह  बताया कि यदि जम्मू कश्मीर को भारत में नहीं मिलाया तो वहां पर आतंकवादी और पाकिस्तानी सेना हमला कर सकती है । कई तरह के प्रस्ताव महात्मा गांधी के द्वारा राजा हरि सिंह के सामने रखे गए थे ।

राजा हरि सिंह ने अपने प्रधानमंत्री रामचंद्र काक की बात मानकर जम्मू कश्मीर को भारत में विलय करने से इंकार कर दिया था ।कुछ समय बीतने के बाद जब जम्मू कश्मीर पर कबायली हमलावरों ने हमला कर दिया था तब हरि सिंह की परेशानियां बढ़ गई थी । कबायली हमलावरों की सहायता पाकिस्तान के राजनीतिक दल एवं वहां के सैनिक कर रहे थे क्योंकि पाकिस्तान यह जानता था कि जम्मू कश्मीर की शक्ति इतनी अधिक नहीं है कि वह पाकिस्तान की सेना से मुकाबला कर सके इसलिए पाकिस्तान ने कव्वाली  हमलावरों की सहायता की थी ।

जिससे कि जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह डर जाएं । कबायली हमलावरों ने जम्मू कश्मीर के अंदर घुुुसना प्रारंभ कर दिया था । जब इस बात की खबर राजा हरि सिंह को लगी तब वह पूरी तरह से परेशान हो गए थे । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राजा हरि सिंह को एक सूचना भी भिजवा दी थी कि जम्मू कश्मीर पर हमला होने वाला है । यह बात सुनकर राजा हरि सिंह ने एक पत्र लिखा और पत्र में यह लिखा कि जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए भारत से सैनिक भेजे जाएं ।

जब यह पत्र भारत सरकार के पास आया तब जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में एक कमेटी बनाकर  तैयार की गई थी । कमेटी के माध्यम से जम्मू कश्मीर के मामले में फैसला लिया जाना था । उस समय लॉर्ड माउंटबेटन को भी बुलाया गया था । लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर भारत के राजनेताओं को यह बताया गया था कि यदि भारत जम्मू कश्मीर को सैनिक बल भेजे तो वहां के राजा से स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट पर साइन करवा लेना चाहिए ।

इसके बाद स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट भारत सरकार के द्वारा राजा हरि सिंह के पास भेजा गया और हरी सिंह ने उस एग्रीमेंट पर साइन कर दिए थे ।  कबायली हमलावर धीरे-धीरे श्रीनगर से होते हुए जम्मू कश्मीर में पहुंच गए थे और इस बात की पूरी जानकारी राजा हरि सिंह को हो गई थी । राजा हरि सिंह को यह पता चल चुका था कि यदि भारतीय सैनिक बल जम्मू कश्मीर में नहीं आया तो यहां पर कबायली हमलावरों का राज हो जाएगा ।

27 सितंबर को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को एक पत्र लिखा था और उस पत्र में जम्मू कश्मीर पर फैसले लेने की बात की गई थी । सरदार वल्लभभाई पटेल शांति से जम्मू कश्मीर के मुद्दे को सुलझाना चाहते थे । 22 अक्टूबर को जब कबायली हमलावरों ने हमला कर दिया था तब राजा हरि सिंह बुरी तरह से घबरा गए थे । 24 अक्टूबर को हमलाबर बारामूला पहुंचे । हमलावरों को यह मालूम नहीं था कि भारत की केंद्र सरकार ने दिल्ली से जम्मू कश्मीर की सुरक्षा के लिए सैनिक बलों को भेज दिया है ।

जब भारतीय सैनिकों को जम्मू-कश्मीर में भेजा गया तब कबायली हमलावरों को वहां से भगा दिया गया था । जम्मू कश्मीर की सुरक्षा के लिए भारतीय सैनिकों का जत्था भेजा गया था । भारतीय सैनिकों के द्वारा जम्मू-कश्मीर की रक्षा , सुरक्षा की गई थी । इसके बाद भी जम्मू कश्मीर का मुद्दा पूरी तरह से सुलझ नहीं सका था ।

संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू कश्मीर मुद्दा – जब जम्मू कश्मीर का मुद्दा सुलझता हुआ नजर नहीं आ रहा था तब भारत ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ के बीच में ले जाने का निश्चय किया था और यह निर्णय लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर लिया गया था । यह विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ में गया और वहां पर पाकिस्तान की ओर से पैरवी जफरुल्लाह खान कर रहे थे । वहां पर जफरुल्लाह खान ने इस विवाद को बड़ी सरलता से एवं दिमाग से संयुक्त राष्ट्र संघ के सामने रखा ।

पाकिस्तान की ओर से जफरुल्लाह खान ने संयुक्त राष्ट्र संघ के बीच में यह बात रखी की कश्मीर पर बंटवारे के समय जो हमला हुआ और उत्तर भारत में हुए सांप्रदायिक दंगों का सबसे बड़ा कारण  वहां के मुसलमानो भाइयों पर हो रहे अत्याचार था क्योंकि जम्मू कश्मीर के मुस्लिम समुदाय के लोग कई तरह की तकलीफों से गुजर रहे हैं । जम्मू कश्मीर के मुस्लिम भाई जम्मू कश्मीर का  विलय पाकिस्तान में करना चाहते हैं ।

संयुक्त राष्ट्रीय संघ परिषद में भारत थोड़ा सा कमजोर पड़ गया था क्योंकि कश्मीरी घाटी के कुछ लोग जम्मू कश्मीर का भारत में विलय होने का विरोध जता रहे थे । संयुक्त राष्ट्र संघ परिषद में दोनों देशों की दलीलें सुनने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारियों ने । जम्मू कश्मीर प्रश्न से बदलकर भारत पाकिस्तान प्रश्न कर दिया था । इस केस में भारत की कश्मीर पर पकड़ थोड़ी कमजोर हो गई थी ।

जम्मू कश्मीर मुद्दे पर जवाहरलाल नेहरू जी के विचार – भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू कश्मीर मुद्दे पर अपने कई सुझाव दिए थे । पंडित जवाहरलाल नेहरु जी ने कई विकल्प जम्मू कश्मीर मसले को सुलझाने के लिए दिए थे और वह विकल्प इस प्रकार से हैं । पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए पहला विकल्प यह दिया था कि पूरे राज्य में जनमत संग्रह किया जाए ताकि जम्मू कश्मीर में रहने वाले लोग यह फैसला कर सकें की उनको किस देश के साथ में रहना है ।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दूसरा विकल्प यह दिया था कि राज्य का विभाजन कर दिया जाए । राज्य का विभाजन इस प्रकार से किया जाए की जम्मू भारत का हिस्सा बने और बाकी का हिस्सा पाकिस्तान को मिले । जवाहरलाल नेहरू ने तीसरा विकल्प यह दिया था कि जम्मू कश्मीर एक आजाद राज्य के रूप में काम करें । जम्मू कश्मीर को फैसले लेने की आजादी हो और जम्मू कश्मीर की सुरक्षा एवं मदद भारत एवं पाकिस्तान दोनों मिलकर करें ।

जवाहरलाल नेहरु के द्वारा चौथा विकल्प यह दिया गया था कि राज्य का विभाजन इस तरह से किया जाए कि जम्मू के साथ-साथ कश्मीर घाटी का भारत में विलय किया जाए । इसके बाद जो हिस्सा बचता है उस हिस्से को पाकिस्तान को दे दिया जाए । पंडित जवाहरलाल नेहरू इन सभी विकल्पों में से चौथे विकल्प के पक्षधर थे ।

जम्मू कश्मीर की 370 धारा- जब जम्मू कश्मीर विवाद का हल नहीं निकल रहा था तब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के द्वारा जम्मू कश्मीर में 370 धारा लागू की गई थी । 370 धारा लागू होने के बाद जम्मू कश्मीर को अपने निर्णय लेने के अधिकार दिए गए थे । जम्मू कश्मीर का संविधान भी अलग था और वहां का झंडा भी अलग था । 370 धारा के तहत जम्मू कश्मीर को अलग राज्य का दर्जा दिया गया था । जम्मू कश्मीर पर कुछ भारतीय कानून भी लागू नहीं था ।

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