हिंदी साहित्य का काल विभाजन hindi sahitya ka kaal vibhajan in hindi

hindi sahitya ka kaal vibhajan in hindi

दोस्तों आज हम आपको हिंदी साहित्य के काल विभाजन के बारे में बताने जा रहे हैं . चलिए अब हम इस लेख के माध्यम से हिंदी साहित्य के काल विभाजन के बारे में पढ़ेंगे

hindi sahitya ka kaal vibhajan in hindi
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image source –https://www.hindietools.com/2016/07/Hindi

हिंदी साहित्य का काल विभाजन भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न रूपों में किया है . हिंदी साहित्य का काल विभाजन करने के बाद इनका नामकरण भी किया है . हिंदी साहित्य का काल विभाजन करने में निम्न साहित्यकारों का योगदान रहा है जैसे कि डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी , डॉक्टर श्यामसुंदर दास , आचार्य रामचंद्र शुक्ल , डॉ रामकुमार वर्मा , राहुल सांकृत्यायन , मिश्र बंधु  आदि।

हिंदी साहित्य के काल विभाजन को 4 भागो में विभाजित किया गया है जैसे कि वीरगाथा काल , भक्ति काल , रीतिकाल और आधुनिक आदि .  वीरगाथा काल 1050 से 1375 तक था इसके बाद भक्ति काल को 1374 से 1700 तक रखा गया है  रीतिकाल को 1700 से 1900 तक रखा गया है आधुनिक काल 1900 से अभी तक चल रहा है . हिंदी साहित्य के काल विभाजन में शुक्ल जी का कहना था कि जिस कालखंड में विशेष प्रकार की रचनाओं की अधिकता दिखलाई पड़े उन रचनाओं में निहित मुख्य प्रवृत्ति का नामकरण किया जाना चाहिए जिसके द्वारा हर काल का प्रधान लक्ष्य निर्धारित किया जा सकता है .

शुक्ल जी का मानना था  कि ग्रंथों की प्रसिद्धि काल निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाती है . विविध काल की रचना में विशेष प्रगति के अनुसार ही नामकरण किया गया है . हम यह नहीं कह सकते हैं कि दूसरी प्रवृत्ति की रचना में एक काल की रचना होती है यदि हम भक्ति काल और  रीतिकाल को देखें तो उसमें वीर रस के ऐसे अनेक काव्य  मिलेंगे जिनमें साहसी राजाओं की प्रशंसा उसी ढंग से की गई थी जिस ढंग से वीरगाथा काल में की गई है . इसी प्रकार से आदि काल में भी भक्ति की  सामग्री हम सभी को भरपूर मिलती है .

वीरगाथा काल के विषय में आचार्य शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक काल को वीरगाथा काल के नाम से संबोधित किया है . भक्ति काल के  हिंदी साहित्य के काल को कुछ लोग पूर्व मध्यकाल और कुछ लोग धार्मिक काल कहते  हैं लेकिन इस काल में तीन प्रमुख प्रवृतियां हैं जो ज्ञान मार्गी , भक्ति मूलक , प्रेम मार्गी हैं . रीतिकाल के विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने रीति ग्रंथों , रस अलंकार  की मूल प्रवृत्ति के कारण ही इस काल को रीतिकाल कहा है . आचार्य विश्वनाथ प्रसाद इसे श्रंगार  कहना उचित मानते हैं .

कालो का विभाजन सर्वप्रथम डॉक्टर जोर्ज ग्रियर्सन ने किया था . डॉक्टर जॉर्ज ग्रियर्सन ने भक्ति काल को स्वर्ण युग कहा था लेकिन किसी ने उनकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया था . आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के काल को  चार भागो में  विभाजन किया था और आचार्य रामचंद्र शुक्ल की बात को सभी ने माना था . सभी की सहमति से यह पारित किया गया था की  हिंदी साहित्य के काल को 4 भागो में विभाजित किया जाए .

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काल विभाजन को डॉक्टर श्यामसुंदर दास जी के द्वारा मान्यता प्राप्त हुई थी . श्यामसुंदर दास के साथ डॉक्टर नगेंद्र ने भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काल विभाजन को मान्यता दी थी लेकिन डॉ धीरेंद्र वर्मा हिंदी साहित्य काल को तीन भागो  में विभाजित करना चाहते थे .

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