जैविक खेती पर निबंध Essay on organic farming in hindi

Essay on organic farming in hindi

Organic farming – दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से जैविक खेती के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और इस आर्टिकल को पढ़कर जैविक खेती के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं ।

Essay on organic farming in hindi
Essay on organic farming in hindi

Image source – https://en.m.wikipedia.org/wiki/No-till_farming

जैविक खेती के बारे में – जैविक खेती प्राचीन समय में भारत देश में बहुत अधिक की जाती थी । जैविक खेती रसायन मुक्त खेती होती है । जिसमें रसायनिक खादों का उपयोग नहीं किया जाता है । प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से जो खेती की जाती है वह खेती जैविक खेती कहलाती है । कीटनाशकों के बिना भूमि की उर्वरक शक्ति को मजबूत करने के लिए हरी खाद , फसल चक्र , कंपोस्ट खाद का प्रयोग अधिक किया जाता है । जैविक खेती पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त होती है । जैविक खेती से भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है ।

यदि हम 1990 से पहले की बात करें तो विश्व में जैविक खेती को बढ़ावा नहीं दिया जाता था क्योंकि रासायनिक खाद का उपयोग करके खेती का उत्पादन करने की ओर कदम सभी लोग बढ़ा चुके थे ।यदि हम भारत में की जाने वाली खेती के बारे में बात करें तो प्राचीन समय से ही भारत देश में , भारत देश के किसान जैविक खेती किया करते थे । विदेशों से आई रासायनिक खेती की सभ्यता के बाद भारत देश के किसान भी अधिक उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खेती करने लगे थे । जैविक खेती करने से किसी भी तरह का कोई प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता है और ना ही भूमि की उर्वरक क्षमता नष्ट होती है ।

जैविक खेती के माध्यम से जो अनाज उत्पन्न होता है उस अनाज ने बहुत अधिक ऊर्जा होती है । जैविक खेती से प्राप्त अनाज का उपयोग जब हम करते हैं तब हमें हमारे शरीर को काफी पोस्टिक आहार मिलते हैं । जैविक खेती करने से सिंचाई अंतराल में बहुत अधिक वृद्धि होती है । जैविक खेती के द्वारा प्राप्त हुए अनाज की मांग बाजार में बहुत अधिक बढ़ने से किसानों का भी बहुत अधिक लाभ होता है क्योंकि जैविक खेती से प्राप्त अनाज रोगमुक्त होता है । रोग मुक्त होने के साथ-साथ जैविक खेती से प्राप्त अनाज स्वाद युक्त होता है । आज हम सभी जैविक खेती के महत्व को जानते हैं ।

जैविक खेती के उपयोग करने से कई तरह की समस्याओं का समाधान प्राप्त होता है । जैविक खेती के प्रयोग करने से हम सभी को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि प्रदूषण काफी हद तक कम होता है ।

जैविक खेती के उत्पाद के बारे में – जैविक खेती के माध्यम से फल , सब्जी की खेती करने से काफि लाभ प्राप्त होता है क्योंकि जैविक खेती करने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है और मिट्टी में इतनी शक्ति उत्पन्न होती है कि वह पानी को   वाष्पीकरण नहीं होने देती है और मिट्टी मे नमी बनाकर रखती है । जैविक खेती के माध्यम से जो भी फल , फ्रूट उत्पन्न होते हैं उन सभी फल फ्रूट में एक अलग ही प्रकार का स्वाद उत्पन्न होता है ।

जैविक खेती को करने में काफी लोग सोच विचार करते  हैं क्योंकि किसान अधिक से अधिक पैदावार प्राप्त करना चाहता है । जिसके लिए वह किसान रसायनिक खादों का उपयोग करके खेती करता है । जिसके कारण मिट्टी की उर्वरक क्षमता बर्बाद होने लगती है । जैविक खेती के उत्पादन से पर्यावरण स्वच्छ रहता है । जैविक खेती वर्मी कंपोस्ट खाद के माध्यम से की जाती है । गोबर के द्वारा खाद बनाया जाता है और उस खाद्य को खेतों में डाला जाता है ।

किसान अपनी भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए  खेतों में खाद डालते हैं जिससे केंचुआ भूमि को कुरेद कुरेद कर उपजाऊ भूमि बनाते हैं और वह भूमि अधिक उपजाऊ हो जाती है , भूमि की उर्वरक क्षमता भी बढ़ती है । जैविक खेती में यदि फसलों पर किट उत्पन्न होते हैं तो नीम एवं और भी कई प्राकृतिक तत्वों  के माध्यम से  घोल बनाकर पानी मे मिलाकर  फसलों पर छिड़का जाता है जिससे की फसलों पर कीट उत्पन्न ना हो पाए । जब किसान जैविक खेती करते हैं तब किसानों की भूमि की उपजाऊ क्षमता में काफी बदलाव आता है ।

जैविक खेती के कारण किसानों की भूमि की उपजाऊ क्षमता बहुत अधिक बढ़ जाती है और अधिक मात्रा में फसल का उत्पाद होता है । जैविक खेती करने से कम मात्रा में सिंचाई की जाती है क्योंकि जैविक खेती करने पर मिट्टी नमी बनाए रखती है । जैविक खेती उपयोग करने से खेती की पारिस्थितिकी तंत्र का प्रभाव बना रहता है और फसल चक्र प्रभावित नहीं होता है । किसान जैविक खेती से अपनी भूमि को बंजर होने से भी बचाता है क्योंकि रसायनिक खेती करने से मिट्टी कम उपजाऊ वाली हो जाती है और मिट्टी की उर्वरक क्षमता में भी कई तरह का बदलाव दिखाई देता है ।

यदि किसान अच्छी तरह से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके जैविक खेती करें तो वह जैविक खेती के माध्यम से अधिक से अधिक उत्पाद प्राप्त कर सकता है । भारत देश में प्राचीन समय में प्राकृतिक संसाधनों के द्वारा खेती की जाती थी । सभी के घरों में गाय को पाला जाता था और गाय के मल मूत्र के माध्यम से एवं गाय के गोबर से एक घोल बनाकर खेतों में फेंक दिया जाता था जिससे खेतों की मिट्टी अधिक से अधिक उपजाऊ हो जाती थी और अधिक मात्रा में स्वादिष्ट फसल उत्पन्न होती थी ।

प्राचीन समय में जैविक खेती करने के लिए कचरे को एक जगह  पर एकत्रित करके खाद्य बनाया जाता था । जिस खाद्य से जैविक खेती की जाती थी और कचरे के कारण जो प्रदूषण फैलता था उस प्रदूषण को इस तरह से रोक दिया जाता था ।

प्राकृतिक तरीके से की जाने वाली जैविक खेती के बारे में – प्राकृतिक तरीके से जो जैविक खेती की जाती है उस खेती में जैविक अपशिष्ट पदार्थों को एकत्रित करके खेतों में डाल दिया जाता है । जैविक अपशिष्ट  मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ा देते हैं । खेतों के द्वारा जो अपशिष्ट एकत्रित होते हैं उन सभी अपशिष्ट को पुनः मिट्टी में मिला दिया जाता है । इसके साथ साथ प्राकृतिक जैविक खेती में पशु के द्वारा प्राप्त होने वाले अपशिष्ट पदार्थों को भी एकत्रित करके पेस्ट बनाकर खेत में डाल दिया जाता है । जिससे खेतों की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है ।

प्राकृतिक खेती अन्य तरह की खाद्य बनाकर खेतों में वह  खाद डालकर खेती की जाती है । जब कोई किसान प्राकृतिक तरीके से जैविक खेती करता है तब उस को काफी लाभ होता है क्योंकि आज के समय में बाजार में जैविक खेती से प्राप्त अनाज की मांग बहुत अधिक है क्योंकि रसायनिक तरीके से की गई खेती से प्राप्त अनाज से कई तरह की बीमारियां फैल रही हैं । इसीलिए जैविक खेती से प्राप्त अनाज की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । यदि किसान जैविक खेती करके अपना उत्पादन बढ़ाए तो वह जैविक खेती के माध्यम से काफी लाभ प्राप्त कर सकता है । जैविक खेती कोई कठिन खेती नहीं है ।

प्राचीन समय में जैविक खेती के माध्यम से अनाज को उत्पन्न किया जाता था । परंतु बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण अनाज की पैदावार को बढ़ाने के लिए हमारे भारत देश में रसायनिक खादों का उपयोग करके उत्पादन को बढ़ाने में ध्यान केंद्रित किया गया जिससे उत्पादन तो बड़ा परंतु मिट्टी की उर्वरक क्षमता पर काफी प्रभाव पड़ा है ।

जैविक खेती के प्रकार के बारे में – जैविक खेती मुख्य रूप से दो प्रकार से की जाती है पहला प्रकार जैविक खेती को एकीकृत के माध्यम से करना । जो किसान जैविक खेती एकीकृत के माध्यम से करता है वह काफी अधिक मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों को एकत्रित करके खेतों को तैयार करता है । जब खेत बोने की बारी आती है तब उस खेत में जैविक खाद डाल दिया जाता है और उस खेत को पूरी तरह से तैयार कर लिया जाता है । जब खेत तैयार हो जाता है तब उसमें फसल के बीज डाल दिए जाते हैं और वह बीज अपना काम करना प्रारंभ कर देते हैं ।

जब फसल धीरे-धीरे बड़ी होने लगती है तब फसल को कीड़े , मकोड़ों से बचाने के लिए नीम की पत्तियों का घोल बनाकर फसल पर छिड़क दिया जाता है । इस तरह से एकीकृत के माध्यम से किसान खेती करके काफी मुनाफा प्राप्त करता है । जैविक खेती बहुत ही लाभप्रद खेती है ।जैविक खेती करने पर मिट्टी की उर्वरक क्षमता बनी रहती है क्योंकि जैविक खेती करने के लिए प्राकृतिक पोषक तत्वों का ज्यादातर उपयोग किया जाता है । इसी तरह से जैविक खेती के प्रकार का दूसरा साधन है जैविक खेती के शुद्ध रूप को अपनाना ।

जैसे जैविक खेती करने पर किसी भी तरह का कीटनाशक रसायन उपयोग में नहीं लाया जाता है । यदि पेड़ों को कीड़ों से खतरा होता है तो उसको प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव किया जाता है और वह छिड़काव कीड़ों को नष्ट कर देता है । जो भी किसान जैविक खेती करता है वह पूरी मेहनत के साथ उस खेती को करता है । जब जैविक खेती में अनाज उत्पन्न होता है तब वह अनाज अधिक मूल्य में बाजारों में बिकता है क्योंकि जैविक खेती से प्राप्त अनाज  अच्छी गुणवत्ता बाला होता है । जिसके उपयोग से मनुष्य के स्वास्थ्य पर किसी भी तरह का कोई भी बुरा नुकसान नहीं होता है ।

आज के समय में जैविक खेती के महत्व के बारे में – आज हम देख रहे हैं कि कई किसान खेती के माध्यम से अधिक मुनाफा  प्राप्त करने के लिए खेतों में कई रसायनिक खादों का उपयोग कर रहा है । जब किसान फसल में कीटनाशक दवाइयां डालता है तब वह रसायन फसल के स्वाद को नष्ट कर देता है और उस हानिकारक रसायन के कुछ तत्व फसल में रह जाते हैं ।  जब हम उस अनाज का उपयोग करते हैं तब हमें उस अनाज से काफी बीमारियां हमारे शरीर को लग जाती हैं ।

खेतों में जो हानिकारक रसायन कीटों को मारने के लिए डाला जाता है वह रसायन धरती के अंदर चला जाता है और पानी में घुलनशील हो जाता है और वह पानी जब हम कुए , नदी , नल के माध्यम से  पीने के लिए उपयोग करते हैं तब वह पानी हमारे शरीर के अंदर जाता है और हमें कई तरह की बीमारियां लग जाती हैं । इसलिए आज मनुष्य के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए जैविक खेती करने की आवश्यकता है । प्राचीन समय में जब किसान पूरी तरह से जैविक खेती करता था तब खेतों की उर्वरा क्षमता बहुत अधिक होती थी ।

परंतु धीरे-धीरे अधिक उत्पादन करने के लिए किसान रसायनिक खेती करने लगा और जिससे धरती की उर्वरता धीरे-धीरे नष्ट होने लगी है । यदि किसानों ने खेतों में यूरिया और भी कई रसायनिक छिड़काव करना बंद नहीं किया तो आने वाले समय में मिट्टी की उर्वरक क्षमता पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी । इसलिए आज के समय में जैविक खेती करना बहुत ही जरूरी हो गया है । जैविक खेती करने से कई तरह की बीमारियां तो नष्ट होती हैं बल्कि प्रदूषण से भी मुक्ति मिलती है । इसलिए आज के समय की मांग जैविक खेती करना  है ।

मध्यप्रदेश में किए गए जैविक खेती आंदोलन के बारे में – जैविक खेती की उपयोगिता को देखते हुए मध्य प्रदेश की सरकार के द्वारा जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई तरह के प्रयास किए गए हैं । जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश में सन 2001 और 2002 के समय एक आंदोलन भी चलाया गया था ।  तकरीबन 313 गांव में जैविक खेती शुरू करने के लिए प्रचार प्रसार किया गया था । जिसका असर 313 ग्रामों में पड़ा और वहां पर जैविक खेती की शुरुआत हुई ।

जैविक खेती की उपयोगिता को किसानों को समझाने के लिए , बताने के लिए भोपाल में मध्य प्रदेश शासन के द्वारा एक सेमिनार भी रखा गया था और उस सेमिनार में मध्य प्रदेश के कई गांवों से किसानों को बुलाया गया था । जिसमें फसल विशेषज्ञों के माध्यम से किसानों को जैविक खेती की उपयोगिता के बारे में बताया गया था । मध्यप्रदेश शासन का जैविक खेती के लिए सेमिनार रखने का सिर्फ एक ही उद्देश्य था और वह उद्देश्य जैविक खेती का प्रचार प्रसार करना था क्योंकि जैविक खेती करने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है और कई तरह के लाभ जैविक खेती करने से होते हैं ।

भोपाल में हुए जैविक खेती सेमिनार में किसानों को यह बताया गया था की यदि किसान जैविक खेती करना प्रारंभ करें तो किसान की भूमि की उपजाऊ क्षमता दिन प्रतिदिन बढ़ती जाएगी और फसल उच्च गुणवत्ता की पैदा होगी । किसानों को सेमिनार के माध्यम से यह बताया गया था कि यदि किसान जैविक खेती करता है तो उसके सिंचाई अंतराल में भी वृद्धि होगी । यदि किसान जैविक खेती करना प्रारंभ कर दे तो किसान को रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं होना पड़ेगी ।

जब किसान रासायनिक खाद का उपयोग करना कम कर देगा तो किसान को खेती करने में कम लागत आएगी और फसलों की उत्पादकता में भी वृद्धि  होगी । किसानों को फसल विशेषज्ञों के माध्यम से भोपाल सेमिनार में यह बताया गया था कि आज हम देख रहे हैं कि बाजारों में केमिकल युक्त प्रोडक्ट बिक रहे हैं । जिन प्रोडक्ट को हम सभी अपने दैनिक जीवन में उपयोग कर रहे हैं और उन रसायनिक युक्त प्रोडक्ट का उपयोग करके हमारे शरीर को काफी नुकसान हो रहा है ।

पहले कैंसर जैसी घातक बीमारियां नहीं थी परंतु आज हम मिलावटी प्रोडक्ट , केमिकल युक्त प्रोडक्ट का उपयोग कर रहे हैं । जिससे कि हमारे आसपास का वातावरण केमिकल युक्त हो गया है ।हवा में भी केमिकल घुलनशील हो गया है । जिससे हमें सांस लेने में काफी तकलीफ हो रही है । जो फसल केमिकल के माध्यम से उगाई जाती है उस अनाज के उपयोग से कई तरह की बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं ।  आज सभी अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं । यदि किसान जैविक खेती करके अनाज उत्पन्न करें और बाजार में जाकर उस फसल को बेचे तो काफी मुनाफा किसान को हो सकता है ।

कहने का तात्पर्य यह है कि बाजार में जैविक उत्पादों की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है और जो किसान जैविक खेती कर रहा है उन किसानों की आय में भी वृद्धि हुई है । यदि किसान मिट्टी की दृष्टि से देखें तो जैविक खेती सबसे अच्छी खेती है । जैविक खेती के माध्यम से ही भूमि की गुणवत्ता में बहुत अधिक सुधार होता है । जैविक खेती के माध्यम से ही मिट्टी की जल धारण क्षमता बहुत अधिक बढ़ती है । जैविक  खेती करने से भूमि से युक्त पानी का वाष्पीकरण होता है वह वाष्पीकरण कम होगा ।

यदि हम पर्यावरण की दृष्टि से जैविक खेती की उपयोगिता को देखें तो जैविक खेती करने से पानी के स्तर में काफी अधिक वृद्धि होती है , मिट्टी की गुणवत्ता बहुत अच्छी बनी रहती है । जैविक खेती के माध्यम से जो खाद्य पदार्थ उत्पन्न होता है वह खाद्य पदार्थ स्वाद दार होता है । जैविक खेती करने से जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में भी काफी कमी आती है । इसलिए जैविक खेती आज के समय की सबसे बड़ी मांग है और आने वाले समय में यदि किसानों को अपनी भूमि की उर्वरक क्षमता को बनाए रखना है तो जैविक खेती को ही अपनाना पड़ेगी क्योंकि किसान अधिक उत्पादन के लिए जहरीले कीटनाशकों का उपयोग कर , रासायनिक खादों का उपयोग कर फसल के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है ।

जिसका सीधा असर मिट्टी की उर्वरक क्षमता पर पड़ता है और मिट्टी की उर्वरक क्षमता पूरी तरह से नष्ट हो रही है ।

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