सुनार पर निबंध Essay on goldsmith in hindi language

essay on goldsmith in hindi language

Goldsmith – दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से सुनार पर लिखे निबंध के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और इस आर्टिकल को पढ़कर सुनार के बारे में जानते हैं ।

Essay on goldsmith in hindi language
Essay on goldsmith in hindi language

सुनार के बारे में – सुनार भारत के हर कोने में मौजूद हैं ।सुनार को स्वर्णकार भी कहा जाता है क्योंकि सुनार सोने , चांदी की धातु को पिघलाकर कई तरह के सुंदर-सुंदर आभूषण बनाकर तैयार करता है । सुनार के पूर्वज छत्रिय हैं । सुनार बहुत ही चतुर और चालाक होते हैं । सुनार अपनी कला और चतुराई से कई तरह के आभूषण बनाते हैं । जिन आभूषणों को पहनकर काफी लोग अपने जीवन में आनंद प्राप्त करते हैं । सुनार शब्द संस्कृत शब्द का स्वर्णकार का ही 1 अपभ्रंश रूप है जिसे संस्कृत शब्द से लिया गया है । वैदिक काल से लेकर आज तक हर कोनों में सुनार जाति के लोग मौजूद हैं ।

यदि हम वैदिक काल की बात करें तो वैदिक काल में स्वर्णकार के कई उदाहरण पढ़ने को मिलते हैं । सुनार अपनी कला में इतना माहिर होता है की वह अपनी मेहनत और कला से सोना , चांदी के बर्तन , प्लेट्स उपयोगी बर्तन , गोलेट सजावटी सामान बनाने में महारत है । सुनारों के बारे में ऐसा कहा जाता है की सुनार प्रजाति क्षत्रिय प्रजाति के वी अंश है जो प्राचीन समय में राजपूत क्षत्रिय कहलाते थे । सुनारों का व्यवसाय आभूषण बनाना और कृषि का व्यापार  करना है । हमारे भारत में यदि हम सुनारों की जनसंख्या के बारे में बात करें तो भारत देश के हर प्रदेशों में सुनारों की लगभग जनसंख्या 17 करोड़ के आसपास है ।

सुनार की कला की हम जितनी भी प्रशंसा करें उतनी कम है । सुनार सोने  की धातु को पिघलाकर नए-नए आभूषण बनाकर , टांका लगाने , फोर्जिंग करने ,  कास्टिंग करने , सोने की , चांदी की धातु को चमकाने मे माहिर है । सुनार सोना , चांदी के आभूषणों का व्यापार करके अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करता है । प्राचीन समय से लेकर आज तक सुनारों का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है । प्राचीन समय में सुनार राजा महाराजाओं के आभूषण बनाकर अपना भरण-पोषण करते थे और आज सुनारों की प्रजाति भारत के हर कोने में स्थित है ।

सुनार ज्यादातर शहरों में निवास करते हैं और शहरों में रहकर नए-नए आभूषण बनाकर धन कमाते हैं । सुनारों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि सुनार प्रजाति के लोग अपने पूर्वजों के धार्मिक स्थान की पूजा करते हैं । सुनार सोना , चांदी के पुराने आभूषण खरीदने एवं नए आभूषण बेचने का काम करते हैं । सुनार पुराने आभूषणों को गला कर नए आभूषण बनाते हैं और उस आभूषण को चमका कर ग्राहकों को बेचते हैं । सुनार अपनी इस कला से काफी धन कमाते हैं ।

सुनार प्रजाति के लोग अपने पूर्वजों का सम्मान करते है । सुनार अपनी कला और मेहनत के माध्यम से  गिलट के आभूषणों पर सोने की परत एवं चांदी की परत भी चढ़ाते हैं । जब सुनार गिलट के बने हुए  आभूषणों पर  सोने की परत चढ़ाते हैं  तब  कोई भी  उन आभूषणों की चमक को देखकर यह  अनुमान नहीं  लगा पाता है कि वह आभूषण सोने का हैै या फिर गिलट का ।

सुनारों की मैढ़ समाज के बारे में –  सुनार प्रजाति में एक मैढ़  समाज होती है जिसके बारे में यह कहा जाता है की मैढ़ जाति की उत्पत्ति बागेश्वरी देवी के मेल से हुई थी । मैढ़ समाज के बारे में ऐसा कहा जाता है कि त्रेता युग में  एक राजा , जिसका नाम मलूक था  वह राज्य पर राज करता था । बागेश्वरी देवी ने कनकसुरा नाम के एक राक्षस को सोने का बना दिया था । कनकपुरा राक्षस ने बागेश्वर देवी की तपस्या करके बागेश्वरी देवी को प्रसन्न किया था और बागेश्वरी देवी ने कनक सुर राक्षस को वरदान दिया था कि वह सोने का बन जाएगा ।

इसके बाद कनकसुरा राक्षस  अपनी ताकत का गलत उपयोग करने लगा था । इसके बाद बागेश्वरी देवी ने कनकसुरा राक्षस को मारने का विचार बनाया था । जिसके बाद बागेश्वरी देवी ने अपने दाहिने हाथ के मेल से एक आदमी को बनाया था । जब बागेश्वरी देवी के दाहिने हाथ के मेल से एक आदमी की उत्पत्ति हुई तब बागेश्वरी देवी ने उस आदमी को कनकसुरा राक्षस को मारने के लिए कहा था । परंतु वह आदमी डरपोक निकला । जिसके बाद वह डरपोक आदमी महेश्वरी जाति कहलाया । महेश्वरी जाति के लोग उसी वंशज के कहलाते हैं ।

जब बागेश्वरी देवी के कहने पर उस आदमी ने कनकसुरा राक्षस को नहीं मारा तब बागेश्वरी देवी ने अपने बाएं हाथ के मेल से दूसरा आदमी बनाया था । दूसरा आदमी बनाने के बाद बागेश्वरी देवी ने उस आदमी को भी कनक सुर राक्षस को मारने के लिए कहा परंतु वह आदमी भी डरपोक निकला और वह दूसरा आदमी न्यारिया सुनार प्रजाति का कहलाया था । जब उस दूसरे आदमी ने भी कनकसुर राक्षस का वध नहीं किया तब बागेश्वरी देवी ने अपनी छाती के मेल से तीसरा आदमी बनाया और उस आदमी का नाम सिकसू था ।

जब देवी बागेश्वरी ने सिकसू को कनक सुरा राक्षस को मारने के लिए कहा तब वह तैयार हो गया और वह कनकसुरा राक्षस को मारने के लिए निकल गया था । जब मां बागेश्वरी देवी ने कनकपुरा राक्षस को मारने के लिए सिकसू से कहा तब उसने मां बागेश्वरी देवी से कनकसुुरा राक्षस को मारने के बारे में पूछा । जब सिकसू ने मां बागेश्वरी देवी से सिकसू ने कनकसुरा राक्षस को मारने के बारे में पूछा तब मां बागेश्वरी देवी ने सिकसू को यह कहा था कि वह  औपनी बना कर कनकासुर दैव्य के  नखों को उजाल कर उसके सामने प्रस्तुत करें । इसके बाद वह अपने संपूर्ण शरीर को चमकदार बनवाने के लिए कहेगा फिर तुम मेरे पास आना ।

बागेश्वरी देवी ने सिकसू से कहा कि शीशा सोने को खा जाता है फिर बागेश्वरी देवी ने जमीन में से शीशा निकाला और सिकसू से कहा कि इस कांच के गहने बनाकर राक्षस के अंग अंग में पहनाकर उसको आग में बैठा कर धोकनी  से धोकना । जब तुम ऐसा करोगे तब वह कनकासुर राक्षस उसमें भस्म हो जाएगा । इसके बाद सिकसू ने मां बागेश्वरी देवी के कहे अनुसार वैसा ही किया और कनकासुर राक्षस को मारकर देवी के सामने प्रस्तुत हुआ । कनकासुर के पास जो सोने के आभूषण थे वह उसने अपने पास रख लिए और मां बागेश्वरी देवी को उन सोने के आभूषणों के बारे में कुछ भी नहीं बताया था ।

इसके बाद मां बागेश्वरी देवी ने सिकसू से कहा कि तुम बड़े लालची हो । तुमने जो सोना छुपाया है वह गलत है । देवी ने सिकसू को श्राप दिया कि वह हमेशा चोरियां करता रहेगा । इसके बाद सिकसू ने मां बागेश्वरी देवी से कहा कि क्या एक राक्षस को मारने का फल यही मिलता है । इसके बाद मां बागेश्वरी देवी को सिकसू पर दया आ गई और मां बागेश्वरी देवी ने उसे चौकी पर बैठा दिया था । मां बागेश्वरी देवी  सिकसू को चौकी पर बैठाकर अंदर चली गई थी । सिकसू चौकी पर बैठा बैठा परेशान हो गया था । सिकसू के दाहिने हाथ की तरफ बैठे एक व्यक्ति को दासी ने एक थाल में धन ला कर दिया ।

जब सिकसू ने यह देखा तब वह बहुत क्रोधित हुआ और सिकसू ने उस दूसरे आदमी से कहा कि तुमने दूसरे का हक छीना है और सिकसू ने उस आदमी को बद्दुआ दी कि तेरे पास धन तो रहेगा मगर तेरा दिवाला निकलता रहेगा ।यह उत्पत्ति राजस्थान में स्थित मेवना पहाड़ में हुई थी । जो मेवाड़ की सीमा पर स्थित है । जो सिकसू की औलाद कहलाई थी । आज सुनार की इस समाज में श्रीमाली ब्राह्मण भी मिल गए हैं । जिनको बामणिया सुनार कहते हैं । मैढ़ सुनारों का धर्म साक्त है । मैढ़ सुनार मास , शराब का सेवन करते हैं । अब हम मैढ़ समाज की नाता प्रथा के बारे में जानते हैं ।

मैढ़ समाज में एक नाता प्रथा प्रचलित है । इसमें मैढ़ समाज के 4 गोत्र होते हैं । मैंढ़ समाज में यह प्रथा है कि लड़का या लड़की के फेरे सिर्फ चार होते हैं और लड़का लड़की का नाता या संबंध बेवा के पीहर में ही होता है । लड़का या लड़की का नाता जोड़ने से पहले ससुराल वालों की फारगती होना बहुत ही आवश्यक है । यदि फारगती नहीं होती है तो वह लोग अदालत में , पंचायत में कार्यवाही करने के अधिकारी होते हैं । इस समाज में स्त्री अपना नाता अपनी स्वेच्छा से नहीं कर सकती है ।

सुनार की इस जाति में नाता सिर्फ और सिर्फ शनिवार की रात्रि को ही तय किया जाता है । इस जाति के कुछ गोत्र भी हैं जिनके नाम इस प्रकार से हैं । कटारिया , जवड़ा , कुलथा , ढांवर , तोसावड़ , तून घर , दूसलिया , परवाल , देवाल , आसट , अगरोया , बाथरा , बदला , वीवाल , भामा , भंवर , माईच , मांडर , रोडा , सारड़ीवाल , सोना लिया , सीदड़ आदि । मैढ़ सुनार में  कुछ लोग भातड़िया सुनार कहलाते हैं ।

सुनार जाति से संबंधित एक कहानी के बारे में –  सुनार जाति से संबंधित एक कहानी के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं । जिसमे  एक सच्चे सुनार की दास्तां बताई गई है । इस कहानी में सच्चे सुनार की परिभाषा है ।चलिए अब हम इस कहानी को जानते हैं । एक सुनार था जिसके चार पुत्र थे । एक बार सुनार ने अपने चारों पुत्रों को एक जगह पर एकत्रित किया और उस सुनार ने यह विचार बनाया कि मैं अपने चारों पुत्रों की परीक्षा लूंगा । यह सोचकर उस सुनार ने अपने पहले बेटे से पूछा की बेटा तुम बताओ की सच्चे सुनार की परिभाषा क्या है ? यह सुनकर सुनार के पहले बेटे ने कहा कि जो सुनार एक रुपए में से चार आने बचाए वही सच्चा सुनार होता है ।

इसके बाद उस सुनार ने अपने दूसरे बेटे से भी यही पूछा की एक सच्चे सुनार की परिभाषा क्या होती है ? सुनार के दूसरे बेटे ने जवाब दिया कि सच्चा सुनार वही होता है जो एक रुपए में से 50 पैसे बचा कर के अपने पास रख ले और 50 पैसे ग्राहक को दे । इसके बाद सुनार ने अपने तीसरे पुत्र से भी यही पूछा कि सच्चे सुनार की परिभाषा क्या हैं ?  उसके तीसरे बेटे ने कहा एक रुपए में से जो सुनार बारह आना बचाए वही सच्चा सुनार हैं । इसके बाद सुनार ने अपने छोटे बेटे से भी यही पूछा और चौथे बेटे ने सुनार को जवाब दिया कि बात पते की तभी है जब सुनार एक रुपए का रुपया भी ले ले और ग्राहक को खुश भी कर दे ।

जिस समय सुनार का चौथा पुत्र यह बात कह रहा था उस समय उनके पीछे एक अमीर घराने के महाशय खड़े हुए थे । जो सुनार के छोटे पुत्र की बात सुन रहे थे । अमीर महासाय अपने घर चला गया और उसने सोचा कि चलो सुनार के चौथे पुत्र की परीक्षा ले ली जाए । सुनार का पुत्र किस तरह से एक रुपए में से ₹1 पूरा अपने पास रख लेता हैं और ग्राहक को भी खुश करता है । इस तरह का विचार बना कर अमीर महाशय ने सुनार के छोटे बेटे को घर पर बुलाया और कहा कि मुझे एक सोने का सुंदर घोड़ा बनवाना है ।

परंतु मेरी यह शर्त होगी कि तुम सोने का घोड़ा मेरे घर पर ही बनाओगे और सुनार का चौथा बेटा सोने का घोड़ा बनाने के लिए तैयार हो गया था । वह प्रतिदिन अमीर महासाय के घर पर जाकर घोड़ा बनाता और अपने घर पर आकर उसी तरह का एक पीतल का घोड़ा बनाता । जब घोड़ा बनकर तैयार हो गया तब सुनार के चौथे पुत्र ने अमिर महाशय से कहा कि तुम्हारा घोड़ा बनकर तैयार हो गया है । अब इसकी और अधिक सुंदरता के लिए दही ले आओ मैं इसको और भी सुंदर चमका दूंगा ।

अमीर महाशय से यह कहा तो वह दही लाने के लिए तैयार हो गया था । जिस समय वह दही लेने ही जा रहा था उसी समय उसके दरवाजे के बाहर एक ग्वालन दही बेच रही थी और अमीर महाशय ने उस ग्वालन को बुलाया और उसका सारा दही ले लिया । इसके बाद सुनार के छोटे बेटे ने सोने के उस घोड़े को दही के घड़े में डुबो दिया और डुबोने के बाद घोड़े को बाहर निकाल कर महाशय को दे दिया । जब सुनार के छोटे पुत्र ने घोड़ा अमीर महाशय को दिया तब अमीर महाशय  मुस्कुराने लगा और सुनार के चौथे पुत्र से कहने लगा कि एक बात बताओ जब तुम अपने पिता से यह कह रहे थे कि सच्चे सुनार की परिभाषा वही है जो ग्राहक से ₹1 ले भी ले और ग्राहक को खुश कर दें परंतु यह कैसे सिद्ध हुआ ।

इसके बाद सुनार के छोटे पुत्र ने अमिर महाशय  से कहा कि मैंने भी सच्चे सुनार की परिभाषा को सिद्ध किया है ।  मैंने जो घोड़ा आपको दिया है वह सोने का नहीं है बल्कि पीतल का है । अमीर महाशय बोला यह कैसे हो सकता है । मैंने तुम्हें शुद्ध सोना दिया और शुद्ध सोने के घोड़े को तुमने मेरे सामने बनाया हैं । यह  घोड़ा पीतल का कैसे हो सकता है । इसके बाद सुनार के छोटे पुत्र ने अमीर महाशय से कहा कि जब मैं तुम्हारे घर पर सोने के घोड़े को बना रहा था तब मैं अपने घर पर एक पीतल का वैसा ही घोड़ा बना रहा था और जो दही तुमने ग्वालन से खरीदा है वह ग्वालन  कोई और नहीं बल्कि मेरी पत्नी है ।

मैंने  हीं उससे अपने दही के घड़े में पीतल के घोड़े को रखकर लाने के लिए कहा था और जैसे ही मैंने सोने के घोड़े को दही में डुबाया उसमें से असली घोड़ा नहीं निकाला बल्कि नकली घोड़ा निकाला था । मैंने तुम्हें जो घोड़ा  दिया उसके बाद तुम घोड़ा लेकर प्रसन्न हो गए और मैंने सोना भी ले लिया और घोड़े को बनाने के लिए पैसा भी ले लिया । यही सच्चे सुनार की परिभाषा है ।

short essay on goldsmith in hindi – सुनार जाति देश के हर जिलों में स्थित है । जो महिलाओं के सुंदर सुंदर गहने , आभूषण बनाने का काम करते हैं ।सुनार शब्द संस्कृत शब्द के स्वर्णकार से लिया गया है ।सुनार समाज के कई गोत्र होते हैं । सुनार सबसे चतुर एवं दक्ष व्यापारी माना जाता है । जो गहने , बर्तन बनाने का काम करता है । कुछ सुनार ऐसे भी होते हैं जो सोने चांदी के आभूषण बनाने के साथ-साथ खेती करने का काम भी करते हैं । राजस्थान राज्य में स्थित मैंढ़ समाज के सुनार बहुत प्रसिद्ध हैं । जो राजस्थान में बसे हुए हैं ।

प्राचीन समय में मेवना पहाड़ पर इस जाति की उत्पत्ति मानी जाती है । इसके बाद राजस्थान से निकलकर देश के हर कोने में सुनार जाति के लोग बस गए और शहरों में दुकानें खोलकर महिलाओं , नागरिकों के लिए सोना चांदी के आभूषण , बर्तन , प्लैट्स बनाने लगे थे । सुनार जाति के लोगों का आभूषण बनाने का काम काफी पुराना है । इनके पूर्वज भी आभूषण बनाने का काम करते थे । जिसके बाद सुनार जाति के लोग अपने पूर्वजों के काम को आगे बढ़ाने का काम करते हैं । प्राचीन समय से ही स्वर्ण कला मे सुनार माहिर हैं ।

सुनार जाति के पूर्वज क्षत्रिय हैं । सुनार जाति की उत्पत्ति के बारे में ऐसा कहा जाता है कि जब परशुराम भगवान राजपूत क्षत्रिय लोगों को मार रहे थे तब उन राजपूत क्षत्रिय लोगों में से दो राजपूत क्षत्रिय बचकर ब्राह्मण के यहां पर शरण लेने के लिए चले गए थे और ब्राह्मण ने दोनों को बचाने का वचन दिया था । जब उन दो क्षत्रिय राजपूत के बारे में ब्राह्मण से पूछा गया तब ब्राह्मण ने एक को स्वर्ण कारीगर बता दिया और दूसरे को खत्री के व्यवसाय को करने वाला बता दिया था ।

कहने का तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण ने दोनों क्षत्रिय को बचाकर अपने पास रख लिया और जो भी उनके बारे में पूछता उनको भी ब्राह्मण स्वर्णकार एवं खत्री का व्यापारी बता दिया करता था । इसके बाद एक व्यक्ति स्वर्ण कारीगर के काम में माहिर हो गया और दूसरा खत्री के व्यवसाय में माहिर हो गया था । कहने का तात्पर्य है कि यह राजपूत क्षत्रिय समाज के अंश हैं और इनके पूर्वज क्षत्रिय हैं । यह लोग अपने आप को छत्रिय मानते हैं । भारत देश में क्षत्रिय सुनारों की जनसंख्या तकरीबन 17 करोड़ के आसपास है ।

जो शहरों में रहकर सोना चांदी के आभूषण , बर्तन बनाकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं  । एक सुनार अपने बच्चे को आभूषण बनाने की कला अवश्य सिखाता है क्योंकि सुनार यह जानता है कि यह काम उनको उनके पूर्वजों ने दिया है और यह काम हमें हमारे बच्चों को देना है । इस तरह से सुनार जाति निरंतर आगे बढ़ रही है । सुनार अपने बच्चों को चतुर और चालाक बनाते हैं क्योंकि सुनार जब सोना चांदी का व्यापार करता है तब उसे अपनी आंखें , दिमाग बहुत तेज गति से चलाना पड़ता है ।

यदि वह अपना दिमाग नहीं लगाएगा तो वह कभी भी सोना चांदी के व्यापार में उन्नति हासिल नहीं कर पाएगा । इसीलिए सुनार दक्ष एवं चतुर व्यापारी माना जाता है ।

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