गरीब मजदूर की आत्मकथा Essay on garib mazdoor ki atmakatha in hindi

Essay on garib mazdoor ki atmakatha in hindi

दोस्तों आज के हमारे इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाए हैं एक गरीब मजदूर की आत्मकथा, यह एक काल्पनिक आर्टिकल है इससे आप पढ़ें तो चलिए पढ़ते हैं आज के हमारे इस आर्टिकल को

Essay on garib mazdoor ki atmakatha in hindi
Essay on garib mazdoor ki atmakatha in hindi

मैं एक गरीब मजदूर हूं, मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं और काफी सालों से मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करता हूं। मैं अक्सर सुबह 7 बजे अपने नजदीक में ही स्थित शहर पहुंच जाता हूं जिससे मुझे कुछ मजदूरी मिल सके और मैं कुछ कार्य करके कुछ रुपए एकत्रित कर सकूं। मैं रोजाना शहर काम की तलाश में जाता हूं लेकिन कभी-कभार ही मुझे काम मिल पाता है, महीने में लगभग 20 या 22 दिन ही मुझे काम मिलता है बाकी के दिन में बस जाकर वापस आ जाता हूं।

आज मुझे मजदूरी करना पड़ रही है, आज मुझे एहसास हो रहा है कि बचपन में मैंने अपने माता-पिता की बात मानते हुए अच्छी तरह से पढ़ाई की होती तो मुझे ऐसे दिन देखने नहीं पड़ते। मैं जब पांचवी कक्षा में पढ़ता था तब अक्सर मेरे माता पिता मुझसे कहते थे कि बेटा पढ़ाई कर लेकिन मैं इसके बारे में नहीं सोचता था, पढ़ाई में मेरी बिल्कुल भी रुचि नहीं थी मैं दो बार पांचवी कक्षा में फेल हो गया था, आखिर मुझे पढ़ाई बीच में ही छोड़ना पड़ा।

कुछ समय मैं अपने पिताजी की दुकान पर कार्य करता था और जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो मैं मजदूरी करने लगा। आज मैं इतना गरीब हूं कि कभी-कभी तो मेरे दो वक्त का खाना भी नहीं हो पाता है। जब मेरे पिता जी जिंदा थे तभी मेरी शादी नजदीक के गांव की एक लड़की से हो गई थी। आज मैं अपने जैसे कई अन्य मजदूरों को भी देखता हूं उनसे बातचीत करता हूं तो मुझे लगता है कि पता नहीं मैंने पढ़ाई छोड़ कर सही किया या नहीं क्योंकि कई मजदूर तो ऐसे भी हैं जो मेरे से कहीं ज्यादा पढ़े लिखे हैं फिर भी वह मजदूरी करते हैं।

में अक्सर शाम को 5:00 बजे तक अपने गांव पहुंच जाता हूं, मैं अपने साथ में कई खाने वाली चीजें जैसे कि गेहूं का आटा, सब्जियां आदि रोजाना ले आता हूं। मैं रोजाना जितना कमाता हूं उतने से अपना भरण-पोषण कर लेता हूं कभी-कभी मैं सोचता हूं कि यदि इसी वजह से मेरा कुछ दिनों तक काम नहीं लगा तो मेरी क्या स्थिति होगी क्योंकि मैं रोज कमाता हूं और रोज पूरे रुपए खर्च कर देता हूं।

मेरी आमदनी ही बहुत कम है मैं काफी गरीब हूं, मेरे बच्चे भी फटे पुराने कपड़े पहने रहते हैं। मुझे यह सब देख कर अच्छा नहीं लगता लेकिन मैं सोचता हूं कि मैं कर भी क्या सकता हूं। मेरी बीवी भी हमेशा मुझे पूछती रहती हैं की मैं कुछ अपने जीवन में कर नहीं पाया, मेरे बच्चे बड़े हो रहे हैं वह पास में ही एक सरकारी स्कूल में जाते हैं मैं सोचता हूं मैं पढ़ाई नहीं कर पाया तो अपने बच्चों को तो पढ़ाई करने ही दूं।

जब भी कोई शादी हमारे रिश्तेदारों में होती है तो कई बार हम नहीं जाते क्योंकि शादियों में अक्सर लोग नए नए कपड़े पहनने कर जाते हैं लेकिन मैं तो इतना गरीब हूं कि मेरे पास और मेरे परिवार वालों के पास शादियों में पहनने के लिए अच्छे कपड़े भी नहीं है। मुझे अपने जीवन पर काफी अफसोस होता है मैं अक्सर सोचता हूं कि काश मैंने अपने बचपन से ही अपने भविष्य को बनाने के बारे में सोचा होता तो कितना अच्छा होता।

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