लोहार पर निबंध Essay on blacksmith in hindi language

Essay on blacksmith in hindi language

Blacksmith – दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से लोहार पर लिखें निबंध के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और इस आर्टिकल को पढ़कर लोहार के जीवन के बारे में जानते हैं ।

Essay on blacksmith in hindi language
Essay on blacksmith in hindi language

लोहार के बारे में about blacksmith in hindi- लोहार बहुत ही साहसी और मेहनती इंसान होता है । जो अपनी भुजाओं की ताकत से कठोर से कठोर लोहे को पिघला कर उस लोहे की कई तरह की वस्तुएं बनाता है । लोहार अपनी मेहनत से हथोड़ा , छेनी , भाथी  का उपयोग करके लोहे को पिघलाकर कई तरह के उपयोगी सामान बनाने का काम करता है ।। प्राचीन समय से ही लोहार  जाति के लोग लोहे को पिघला कर अस्त्र शस्त्र बनाने का काम करते रहे हैं । लोहार आग में  लोहे को पिघला कर इस तरह से लोहे का आकार बदलते हैं मानो ऐसा प्रतीत होता है कि लोहार लोहे को नया जीवन देने का काम करता है ।

यदि हम लोहे की बात करें तो लोहा बहुत ही कठोर होता है ।लोहा आवर्त सारणी के आठवें समूह का पहला तत्व माना जाता है । जिस तत्व को लोहार आग की भट्टी में तपा कर हथौड़ी के माध्यम से कूट-कूट कर उसका आकार बदल देता है । लोहार प्रजाति भारत देश की सबसे प्राचीनतम  जाती है । लोहार जाति के बारे में ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में लोहार राजा , महाराजाओं को अस्त्र-शस्त्र बनाकर दिया करते थे ।

जब किसी राजा को युद्ध क्षेत्र में जाना होता था तब  राजा लोहार से अच्छे अस्त्र-शस्त्र बनवाया करता था क्योंकि जब लोहार अस्त्र शस्त्र बनाता था तब वह मजबूत से मजबूत शस्त्र बनाकर राजाओं को देकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करता था । कहने का तात्पर्य यह है कि आज ही नहीं बल्कि प्राचीन समय में भी लोहार जाति लोहे को पिघलाकर लोहे को कई रूप देने में सफल हुए हैं । भारत देश में लोहार एक तरह की प्रमुख व्यवसायिक जाति मानी जाती है । एक आम आदमी लोहार की तरह काम नहीं कर सकता है ।

लोहार अपनी भुजाओं की ताकत से लोहे को कूट-कूट कर लोहे को नया आकार देने का काम करता है । जिस काम को करने में हिम्मत , ताकत और लगन की आवश्यकता होती है । लोहार एक कलाकार के रूप में कार्य करता है । जो अपनी कला के माध्यम से लोहे को नए-नए रूप देकर हम सभी के समक्ष प्रस्तुत करता हैं ।आज हम हमारे घर में हसिया , छुरी , फावड़ा , खेती करने में जो औजारों  का उपयोग कर रहे हैं वह सब लोहार की ही देन है । उन सभी वस्तुओं को बनाने में किसी न किसी लोहार ने अपनी मेहनत से लोहे को कूट कूट कर बनाया होगा ।

लोहार प्रजाति की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है । लोहार प्रजाति बहुत ही साहसी , ताकतवर एवं दृढ़ संकल्पी होती है । लोहार प्रजाति के सभी समुदाय के लोग अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए नियम कानूनों को मानते हैं । वह कभी भी पूर्वजों के द्वारा बनाए गए नियम कानूनों उलंघन नहीं करते हैं । लोहार प्रजाति के लोग अपने बच्चों को उसी धंधे को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी देते हैं । इस तरह से प्राचीन समय से भारत देश में लोहार अपना काम बहुत मेहनत से करते रहे है ।

भारत में स्थित लोहार जाति के बारे में – भारत में स्थित लोहार प्रजाति भारत देश के सभी राज्यों में स्थित हैं । जो अपना काम बड़ी मेहनत और लगन से करते हैं ।लोहार जाति अपनी भुजाओं की ताकत से लोहे को पिघलाकर , लोहे का सामान बनाकर , बाजारों में बेचकर अपना और अपने परिवार का जीवन यापन करते हैं ।लोहार प्रजाति को तकरीबन दो भागों में विभाजित किया गया है । कहने का तात्पर्य यह है कि लोहार प्रजाति की निम्नलिखित दो प्रजातियां हैं ।

पहली प्रजाति गाड़िया लोहार होती है एवं दूसरी प्रजाति मालवीय लोहार होती हैं । भारत देश के हर क्षेत्र में यही दोनों प्रजाति के लोग निवास करते हैं और वह  लोहे का सामान बनाकर बाजारों में बेचते हैं ।

गाड़िया लोहार प्रजाति के बारे में – गाड़िया लोहार भारत देश के हर कोने में स्थित हैं । जो अपना जीवन एक घुमक्कड़ की तरह जीते हैं । गाड़िया लोहार का एक सुनिश्चित स्थान नहीं होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि गाड़िया लोहार प्रजाति एक स्थान पर रुक कर अपना जीवन यापन नहीं करते हैं । वह एक शहर से दूसरे शहर जाकर वहां पर तंबू लगाकर , चूल्हे पर रोटी बनाकर ,आग की भट्टी में लोहे को पिघला कर और पिघले  हुए लोहे से कई तरह के सामान बनाकर और उन सामानों को बाजारों में बेचकर  पैसा कमा कर अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं ।

गाड़िया लोहार बेलगाड़ियों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर काम करते हैं । गाड़िया लोहार कभी भी अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए नियम कानूनों का उल्लंघन नहीं करते हैं । गाड़िया लोहार के इतिहास के बारे में ऐसा कहा जाता है कि जब चित्तौड़ पर अपना शासन लागू करने के लिए मुगल शासकों ने आक्रमण कर दिया था तब यह गाड़िया लोहार अपना जीवन खानाबदोश की तरह व्यतीत करने लगे थे । जब मुगल शासकों का भारत देश में शासन नहीं था तब गाड़िया लोहार प्रजाति अपना जीवन बहुत ही अच्छी तरह से व्यतीत करते थे ।

गाड़ियां लोहार प्रजाति के पूर्वज बहुत ही शक्तिशाली थे । गाड़िया लोहार के पूर्वज वचन के पक्के होते थे और उनकी कला के चर्चे चारों तरफ किए जाते थे । गाड़िया लोहार प्रजाति से राजा , महाराजा अपने अस्त्र शस्त्र बनवाया करते थे । जब किसी राजा को लोहार के द्वारा बनाए गए अस्त्र पसंद आते थे तब वह राजा गाड़िया लोहार प्रजाति को इनाम में हीरे मोती देकर सम्मानित करते थे । आज भी भारत देश मे लाखों करोड़ों की संख्या में लोहार प्रजाति के लोग रहते हैं । जो लोहे को पिघला कर लोहे को नया रूप देकर अपना जीवन यापन करते हैं ।

गाड़िया लोहार के बारे में ऐसा कहा जाता है कि गाड़िया लोहार की उत्पत्ति राजस्थान से हुई है । गाड़िया लोहार प्रजाति के पूर्वज राजस्थान राज्य में निवास करते थे । जो धीरे-धीरे चारों तरफ काम की तलाश में इधर उधर भटकते रहते थे । आज भारत के चारों तरफ इस प्रजाति के लोग मौजूद हैं ।

मालवीय लोहार प्रजाति के बारे में – मालवीय लोहार प्रजाति एक ऐसी प्रजाति है जो भारत के हर राज्य , हर प्रदेश , हर जिले में स्थित है । मालवीय लोहार प्रजाति के लोगों का यह कहना है कि मालवीय लोहार प्रजाति के पूर्वज मालवा के रहने वाले थे । मालवीय प्रजाति के लोग मध्यप्रदेश के मालवा के रहने वाले हैं । इसलिए यह लोहार प्रजाति मालवीय लोहार प्रजाति के नाम से जानी जाती है । मालवीय लोहार प्रजाति सुथार का कार्य भी करती है ।

यदि हम मालवीय लोहार प्रजाति की संस्कृति और उनके दृढ़ संकल्प के बारे में बात करें तो यह  बहुत ही महान प्रजाति के लोग माने जाते हैं । मालवीय लोहार प्रजाति के लोग प्राचीन संस्कृति पर बहुत अधिक विश्वास करते हैं ।मालवीय लोहार प्रजाति शक्ति की पूजा करते हैं । शक्ति की पूजा करने के साथ-साथ मालवीय लोहार प्रजाति अग्नि की पूजा भी करते हैं । इसीलिए मालवीय लोहार प्रजाति अपने घर के किसी सदस्य के मृत शरीर को अग्नि में नहीं जलाते हैं क्योंकि यह प्रजाति अग्नि को इष्ट देव मानकर उनकी पूजा करते हैं  क्योंकि अग्नि में ही लोहे को पिघला कर लोहे को नया आकार देने का काम लोहार प्रजाति करती है ।

इसीलिए  मृत व्यक्ति का शरीर यह लोग अग्नि में दहन नहीं करते है । जब इनके परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है तब उस मृत व्यक्ति के शरीर को जमीन में गाड़ दिया जाता है । भारत देश में मालवीय लोहार जाति के लोग भारत देश के चारों तरफ लाखों करोड़ों की संख्या में स्थित है । जो लोहे को पिघला कर लोहे को नया रूप देकर नए-नए सामान बनाकर बाजारों में बेचने का काम करते हैं । मालवीय लोहार प्रजाति के लोग मध्यप्रदेश के मालवा प्रदेश में ही नहीं है बल्कि भारत के चारों तरफ  यह प्रजाति निवास करती है ।

लोहार प्रजाति के द्वारा बनाए गए अस्त्र शस्त्र एवं सामानों के बारे में – लोहार प्रजाति वह प्रजाति है जो इस्पात  को अग्नि में पिघलाकर विभिन्न तरह की वस्तुएं बनाने का काम करती है । लोहार प्रजाति लोहे को पिघला कर हथौड़ी , भाथी एवं छेनी का उपयोग करके लोहे को अपनी भुजाओं की ताकत से कूट-कूट कर , कूट-कूट कर लोहे के फाटक , सब्जी काटने वाला हसिया , चाकू , तलवार , फरसा , दुकानों में लगाई जाने वाली शटल , फाटक में लगने वाले कुंदे , गेंती , फावड़ा , कुल्हाड़ी , खेती में उपयोग किए जाने वाले पंजा और भी कई तरह के औजार का निर्माण लोहार प्रजाति के द्वारा किया जाता है ।

लोहे को नया रूप देने  में लोहार प्रजाति की अहम भूमिका रही है । प्राचीन समय से लेकर आज तक लोहार प्रजाति की मेहनत के कारण ही लोहे को नया रूप और आकार मिलता रहा है । आज जो लोहे के तवे पर रोटियां सेकते हैं इस तवे को भी  लोहार प्रजाति ने बनाया है । लोहार प्रजाति ने हीं अपनी मेहनत से लोहे को पिघला कर लोहे को नया रूप देकर हर तरह के सामान बनाकर हम सभी की सहायता की है । जिसका उपयोग हम करके कई लाभ प्राप्त कर रहे हैं ।

प्राचीन समय में लोहार प्रजाति के लोग राजा महाराजाओं के अस्त्र-शस्त्र बनाने का काम करते थे और आज हम लोगों के लिए कई तरह की वस्तुएं बनाने का काम लोहार प्रजाति करती है ।

लोहार प्रजाति के पहनावे एवं संस्कृति के बारे में – यदि हम लोहार प्रजाति के पहनावे की बात करें तो लोहार  जाति के लोग अपने पूर्वजों के पहनावे को पसंद करते हैं और अपने पूर्वजों की ही तरह कपड़े पहन कर अपना जीवन यापन करते हैं क्योंकि लोहार प्रजाति प्राचीन मान्यताओं एवं संस्कृति का पालन करते हैं और उनके द्वारा बनाए गए संस्कार को अपनाकर अपने आने वाले समय को जीते हैं । लोहार प्रजाति की महिला एवं पुरुष का पहनावा लोहार प्रजाति के सभी लोगों का एक सा होता है ।

यदि हम लोहार प्रजाति की महिला के पहनावे की बात करें तो लोहार प्रजाति की महिला अपने गले में सोना , चांदी , तांबा एवं पीतल इन सभी मे से किसी एक धातु का बना कड़ा अपने गले में पहनती है । लोहार प्रजाति की महिला की यह सबसे बड़ी पहचान है । लोहार जाति की महिला के गलें में कड़े पहनने के कारण कहीं पर भी इनकी पहचान की जा सकती है । यदि कोई महिला गले में कड़े पहनी हुई है तो जरूर वह महिला लोहार जाति की है । लोहार प्रजाति की महिला अपनी भुजाओं में लाख के चूड़े , कांच के चूड़े , तांबे की चूड़ियां पूरे हाथों में पहनती हैं ।

लोहार प्रजाति की महिला अपनी नाक में नथ पहनती हैं । यदि हम लोहार प्रजाति की महिला की चोटी के बारे में बात करें तो वह अपने सिर के बालों की कई तरह की चोटियां बनाती हैं । लोहार प्रजाति की महिला को अपने हाथों में कई तरह के नाम एवं अपने हाथों को गुदवाना बहुत ही अच्छा लगता है और यह  उनकी प्राचीन संस्कृति भी है । लोहार प्रजाति के लोगों ने कुछ नियम कानून भी बनाए हुए हैं इन नियम कानून को मानकर अपना जीवन जीते हैं । सिर पर टोपी , शरीर पर वस्त्र ना पहनना इस प्रजाति की आदत है । लोहार जाति के लोग पक्के घरों में ना रहकर तंबू लगाकर रहना पसंद करते हैं ।वह जमीन पर सोना पसंद करते हैं । लोहार प्रजाति के लोग अपने घरों में कभी भी दीपक नहीं जलाते हैं ।

लोहार प्रजाति के लोग कुएं से पानी नहीं भरते हैं । लोहार जाति के लोग अभी भी अपनी लड़का या लड़की का विवाह दूसरी प्रजाति के लड़कियां , लड़के से नहीं करते हैं । इस तरह से लोहार जाति अपने नियम कानूनों को मानते हैं ।जिन नियम कानूनों का उल्लंघन लोहार प्रजाति कभी नहीं करती है ।

एक लोहार की कहानी- पुष्पदंत पुर के एक छोटे से राजपथ के किनारे एक लोहार की दुकान थी । जहां पर वह लोहार अपनी मेहनत और लगन से लोहे को पीट-पीटकर उस लोहे से अस्त्र-शस्त्र बनाकर अपना और अपने परिवार का जीवन यापन करता था । वह लोहार अपनी कला के लिए प्रसिद्ध था और महान भी था । परंतु उस लोहार की कला को कम ही लोग जानते थे । जितने लोग उस लोहार की कला के बारे में जानते थे वह लोग लोहार की कला की सराहना करने से पीछे नहीं हटते थे ।वह लोहार कभी भी किसी भी व्यक्ति से बुरा भला नहीं कहता था ।

वह सिर्फ घर से दुकान और दुकान से घर जाता था । वह लोहार काम करने में कभी भी मक्कारी नहीं मारता था । वह लोहार जो भी काम करने के लिए अपने हाथ में ले लेता था वह उस काम को पूरी मेहनत और लगन से करता था । जब भी उसके दुकान के सामने से कोई बड़ा सा जुलूस जाता था या फिर किसी राजा महाराजा या सम्राट की सवारी जाती थी तब वह लोहार कभी भी अपना सिर उठाकर उनकी तरफ नहीं देखता था क्योंकि वह सिर्फ अपने काम पर ही ध्यान देता था ।  लोहार लोगों से बहुत ही कम बातचीत किया करता था ।

इसलिए वहां के आसपास के लोग लोहार को दूंगा बेरा समझते थे । कुछ लोगों ने उस लोहार को गूंगा बहरा नाम दे दिया था । वह लोहार मजबूत तलवार एवं अस्त्र-शस्त्र बनाने में बहुत अधिक रुचि रखता था । एक बार उस लोहार की दुकान पर एक आगंतुक आया और लोहार के पास गया । जब उस लोहार ने उस आगंतुक को देखा तब लोहार ने आगंतुक से कहा की आपको क्या काम है । जब लोहार ने आगंतुक से सवाल किया तब आगंतुक ने लोहार से कहा कि मैं तुम्हारी कला और मेहनत से बहुत ही खुश हूं क्या तुम्हें यह पता है कि तुम्हारे देश पर विदेशियों ने आक्रमण कर दिया है ।  यह सुनकर लोहार ने कहा कि ऐसा तो मैंने नहीं सुना है ।

एक बार आगंतुक ने लोहार से इस विषय में फिर से बातचीत की और आगंतुक ने लोहार से कहा कि यदि तुम मुझे एक तलवार बना के दो तो मैं हमारे राज्य में विदेशियों को घुसने नहीं दूंगा । जिसके बदले में तुम जितना धन मांगोगे मैं तुम्हें दूंगा । जब लोहार ने यह सुना तब लोहार ने आगंतुक से कहा कि मुझे इस काम के बदले धन नहीं चाहिए । तुम  इस काम के बदले जीत का पुरस्कार मुझे देना । इस तरह से आगंतुक की बात को मानकर लोहार ने आगंतुक के लिए एक शक्तिशाली तलवार बनाना प्रारंभ कर दिया था । कई समय के बाद जब वह तलवार बन के तैयार हो गई तब लोहार ने उस तलवार को आगंतुक के हवाले कर दी थी ।

तलवार आगंतुक को सौंपने के बाद लोहार इंतजार करने लगा कि कब महा आर्य की सेना युद्ध क्षेत्र में जाए और वहां पर जीत प्राप्त करे । समय बीत जाने के बार पूरे सम्मान के साथ आर्य सेना रणभूमि में लड़ाई लड़ने के लिए जाने लगी और पूरी सेना लोहार के द्वारा बनाए गए अस्त्रों से सुसज्जित थी । जिसे देखकर लोहार बहुत  प्रसन्न हुआ । जैसे ही रणभूमि में आर्य सेना ने विदेशियों को खदेड़ ना शुरू किया तब लोहार के द्वारा बनाई गई तलवार से कई दुश्मनों का सिर काट दिया था ।

जो आगंतुक लोहार की दुकान पर अस्त्र शस्त्र बनवाने के लिए आया था वह आगंतुक महा आर्य की सेना के वीर विजय सेनापति थे । जिनके पास लोहार के द्वारा बनाई गई  शक्तिशाली तलवार थी । जिस तलवार से वीर विजय सेनापति में कई दुश्मनों का सिर धड़ से अलग किया था ।जब महा आर्य सेनापति वीर विजय सेनापति युद्ध रणभूमि के क्षेत्र से विजय प्राप्त करके अपने राज्य की ओर आ रहे थे तब वह लोहार बहुत इंतजार कर रहा था क्योंकि कई वर्ष बीत जाने के बाद महा आर्य सेनापति को विजय प्राप्त हुई थी ।

इधर लोहार को विजय  प्राप्त करने का इंतजार था और वह लोहार यह इंतजार कर रहा था कि कब आर्य सेना विजय प्राप्त करके नगर की ओर आए । जब आर्य सेना विजय प्राप्त करके नगर की ओर आई तब नगर वासियों ने आर्य सेना का भव्य स्वागत , वंदन , अभिनंदन किया और वह लोहार अपने दुकान से ही उस सेना को निहारता गया । जब उस लोहार ने अपने द्वारा बनाए गए अस्त्र शस्त्र सेना के पास देखें तब उसे बहुत प्रसन्नता हुई थी ।

जब वह सेना उसकी दुकान के सामने से निकल गई तब उसने वहां पर उनके स्वागत के लिए बिछाए गए फूलों की पंखुड़ियों में से 2 पंखुड़ियां उठा ली और अपने पास रख ली क्योंकि उसकी यही तमन्ना थी कि आर्य सेना युद्ध की रणभूमि मे जीत प्राप्त करके यहां पर उपस्थित हो और आर्य सेना ने जीत हासिल की थी । इस तरह से लोहार की एक कहानी है । जिस कहानी में लोहार की मेहनत और कला के प्रदर्शन के बारे में पता चलता है ।

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