दीये का अभिमान पर कविता Diye ka abhiman poem in hindi

Diye ka abhiman poem in hindi

दोस्तों कैसे हैं आप सभी, दोस्तों किसी भी इंसान को जीवन में अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि अभिमान ही एक इंसान को अपने आप पर गर्व करना सिखाता है। अभिमानी व्यक्ति अपने आप को ही सब कुछ समझता है जो अभिमान करता है उसका यह अभिमान जरूर टूटता है इसी अभिमान के बारे में बताने वाली एक कविता जो कि द्वारका प्रसाद माहेश्वरी जी ने लिखी है इस कविता में द्वारका प्रसाद माहेश्वरी जी ने एक दिए के अभिमान पर कविता लिखी है

Diye ka abhiman poem in hindi
Diye ka abhiman poem in hindi

यह उनकी एक काल्पनिक कविता है लेकिन वास्तव में यह कविता हम सभी को एक बहुत बड़ी सीख देगी कि हमें अभिमानी क्यों नहीं बनना चाहिए क्योंकि एक अभिमानी व्यक्ति का अभिमान जरूरत टूटता है तो चलिए पढ़ते हैं द्वारका प्रसाद माहेश्वरी जी द्वारा लिखित कविता दिए का अभिमान को

जलते जलते दिए को यह

हो गया अभिमान

लगा सोचने सूर्य चंद्र से

भी में अधिक महान

 

सूरज तो करता है आकर

दिन में सिर्फ प्रकाश

किंतु रात के अंधकार का

मैं ही करता नाश

 

इतने ही में लगा हवा का

हल्का झोंका एक

सिर नीचा हो गया, बुझ गया

रही धुंए की रेख

 

अहंकार का सदा जगत में

होता दुष्परिणाम

करो बिना अभिमान तुम्हें जो

कुछ करना हो काम

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