दशामाता व्रत कथा कहानी dashama vrat katha in hindi

dashama vrat katha in hindi

दोस्तों आज हम आपके लिए लाए हैं दशा माता व्रत कथा कहानी । चलिए अब हम पढ़ेंगे दशा माता व्रत कथा कहानी को ।

एक गांव का राजा था जिसका नाम नल था उसकी पत्नी का दमयंती था, उनके पास अथाह धन संपत्ती थी । उनको किसी प्रकार की कोई भी समस्या नहीं थी वह अपने जीवन को बड़े आराम से जी रहे थे । उस राज्य की सभी जनता उनका सम्मान करती थी। एक बार जब होली दशा का दिन आया तब उनके राज महल में एक ब्राह्मणी आई और रानी से आकर बोली कि आप मेरे से यह दशा माता का डोरा ले लो तब उस रानी की दासी बोली रानी आप इस डोरे को ले लो यह सबसे लाभदायक है जो भी महिला दशा माता का व्रत करती है एवं इस डोरे को अपने गले में बांधती है उसकी सभी मुरादें पूरी होती हैं । रानी ने उससे वह डोरा ले लिया था और दशा माता की पूजा करके डोरा अपने गले में बांध लिया था ।

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जब रात्रि के समय वह अपने कक्ष में गई तब राजा ने उसके गले में डोरा देखा और कहा कि हमारे पास कितनी धन संपत्ति है फिर भी तुमने यह डोरा गले में बांध के रखा है । डोरी की जगह तुमको मोती का हार पहनना चाहिए और राजा ने रानी के कहने से पहले ही वह डोरा उसके गले से निकाल कर जमीन पर फेंक दिया था जिससे दशामाता उनसे रुष्ट हो गई थी। जब राजा रात्रि में अपनी सैया पर लेटा हुआ था तब दशा माता एक रूप धारण करके उसके सपने में आई और कहा तूने दशा माता का अपमान किया है इसलिए आज से तेरे बुरे दिन प्रारंभ हो चुके हैं और वह लुप्त हो गई । जब सुबह हुई तो राजा की धन संपत्ति धीरे-धीरे समाप्त होने लगी वह गरीब हो गया और उसके पास खाना खाने के लिए पैसे भी नही बचे थे । जब राजा ने रानी से कहा कि तुम अपने घर चली जाओ तब रानी ने कहा कि मैं आपको छोड़कर कहीं पर भी नहीं जाऊंगी।

रानी ने राजा से कहा कि हम अपने बच्चों को लेकर कहीं और चले जाते हैं वहां पर कुछ काम करके अपना जीवन यापन कर लेंगे । राजा रानी की बात को मानकर अपने बच्चों को साथ लेकर अपने राज्य से दूसरे राज्य की ओर चला गया । रास्ते में जब वह भील राजा महल पहुंचा और वहां के राजा से उसने कहा कि आप मेरे बच्चों को अमानत के तौर पर रख लो जब मैं आऊंगा तब अपने बच्चों को साथ में ले जाऊंगा और यह कहकर आगे चल दिया । आगे चलते चलते जब राजा के मित्र का गांव आया तब राजा ने रानी से कहा कि चलो अपने मित्र से मिल आए और वह अपने मित्र के पास पहुंचा । मित्र ने उनकी बहुत खातिरदारी की, उनको भोजन कराया और रात में महल में आराम करने के लिए भेज दिया । जब रानी की नजर उस हार पर पड़ी तो वह उस हार को देखने लगी और रानी के देखते ही देखते वह हार एक मोर ने निगल लिया ।

यह देखकर रानी ने अपने पति से कहा कि यह हार गायब हो गया है यदि सुबह राजा ने इस हार के बारे में हमसे पूछा तो हम उन्हें क्या जवाब देंगे । रानी ने राजा से कहा कि हमें इसी समय यहां से निकल जाना चाहिए और राजा रानी की बात को मान कर वहां से रात में ही चले गए । जब सुबह हुई तब रानी ने खूंटी की ओर देखा पर हार दिखाई नहीं दिया तब रानी ने राजा से कहा कि आपका मित्र मेरा हर चुरा कर ले गया हैं । तब राजा ने कहा मेरा मित्र ऐसा कभी भी नहीं कर सकता है । राजा नल और रानी दमयंती आगे चले गए । जाते जाते वह अपनी बहन के गांव पहुंचे। उन्होंने एक व्यक्ति के द्वारा बहन के पास खबर भिजवाई की तुम्हारा भाई और भाभी आ रहे हैं तब उसकी बहन ने उस व्यक्ति से पूछा कि उनकी हालत कैसी है तो उन्होंने कहा कि उनकी बुरी हालत है तब बहन एक थाली में सूखी रोटी लेकर अपने भाई के पास गई और उनको खाने के लिए दिया । राजा ने अपने हिस्से का खाना तो खा लिया लेकिन रानी ने रोटी और सूखी सब्जी को जमीन में गाड़ दिया और आगे चल दिये ।

वह आगे जाते जाते एक गांव में पहुंचे उस गांव के तालाब के किनारे वह आराम करने लगे । राजा ने रानी से कहा कि मैं इस तालाब से कुछ मछली निकालकर आपको दे देता हूं आप इन मछलियों को तल लेना, मैं गांव से भोजन की व्यवस्था करके आता हूं । ऐसा कहकर राजा गांव में भोजन की तलाश में चल दिया। राजा जब गांव में पहुंचा तब उसने देखा कि एक सेठ सभी को भोजन करा रहा है तो उसने वहां से भोजन लिया और रानी के पास चल दिया । रास्ते में एक चील ने उसके भोजन पर झपट्टा मार दिया और भोजन जमीन पर गिर गया। राजा सोचने लगा कि रानी सोचेगी कि मैंने ही पूरा भोजन कर लिया है । इधर रानी जब मछलियों को तल रही थी तब वह मछली जिंदा होकर वापस पानी में कूद गई थी । रानी ने सोचा कि राजा सोचेंगे कि उसने मछली भूनकर खाली हैं।

जब राजा रानी के पास पहुंचा तब दोनो मुस्कुराने लगे। दोनों ने एक दूसरे से कुछ भी नहीं पूछा और वह आगे चल दिए । जब राजा रानी के गांव पहुंचे तब राजा ने कहा तुम अपने घर पर चली जाओ और वहां पर दासी का काम कर लेना , मैं इसी गांव में कुछ काम ढूंढ लूंगा । रानी अपने मां के घर पर दासी का काम करने लगी और राजा उसी गांव में एक तेली के यहां पहुंच गया और वहां पर काम करने लगा था । कुछ समय तक वह वहीं पर काम करते रहे और अपना जीवन यापन करते रहे । जब दशा माता का दिन आया तब महल में सभी पूजा पाठ की तैयारी कर रहे थे तब रानी दमयंती सभी का सिर धो कर उनको तैयार कर रही थी तब उस रानी की मां ने उस रानी से कहा कि तुम भी आ जाओ मैं तुम्हारा सिर मुड़ देती हूं। जब वहां की रानी दमयंती का सिर मुड़ रही थी तो रानी ने दमयंती के सिर में वह निशान देख लिया और कहा कि ऐसा ही निशान मेरी बेटी के सिर पर था और उसे अपनी बेटी की याद आने लगी। रानी के आंसू उस पर गिरने लगे जब दमयंती ने उस रानी से कहा आप रो क्यों रही हो तब उसने कहा कि जैसा निशान तुम्हारे सिर पर है वैसा ही निशान मेरी बेटी के सिर पर भी है।

ये निशान देखकर मुझे मेरी बेटी की याद आने लगी है तब दमयंती ने कहा कि मैं ही तुम्हारी बेटी हूं और उसने अपनी मां को सारी कहानी बता दी । उसकी मां उससे कहने लगी की तुमने पहले यह क्यों नहीं बताया था । उसने कहा कि यदि मैं आपको यह पहले बता देती तो मैं अपने कष्टों को किस तरह से सहन करती । उसकी मां ने दमयंती से पूछा कि राजा कहा है तब उसने कहा कि वह एक तेली के यहां काम कर रहे हैं उसी समय रानी ने राजा को पूरे गांव में ढूंढवाया और राजा को महल में बुलवाया । राजा को अच्छे वस्त्र पहनाए, उसको अच्छा भोजन करवाया। कुछ समय राजा रानी वहीं पर रुके थे जब वह अपने राज्य की ओर जाने लगे तब दमयंती के पिता ने राजा को बहुत सारा धन ,हाथी घोड़े देकर विदा किया। वह अपने राज्य की ओर चल दिए जब वह उस गांव में पहुंचे जहां पर उन्होंने मछली को तला था तब रानी कहने लगी कि आपने सोचा होगा कि वह मछली मैंने खा ली हैं लेकिन वह मछली तो जिंदा होकर वापस पानी में चली गई थी।

वहां से निकलने के बाद वह उस स्थान पर पहुंचे जहां पर चील ने उनके खाना पर झपठा मारा था तब राजा ने कहा कि रानी आपने यह सोचा होगा कि यह भोजन मैंने किया होगा लेकिन उस भोजन पर एक चील ने झपट्टा मार दिया था जिसके कारण यह भोजन जमीन पर गिर गया था । इसके बाद वह दोनों आगे की ओर चल दिए। तब वह अपने बहन के गांव पहुंचे और बहन को जब पता चला कि उसके भाभी भैया आ रहे हैं तब बहन ने गांव के व्यक्ति से पूछा कि उनके हालात कैसे हैं तब व्यक्ति ने कहा कि तुम्हारे भैया भाभी बड़े खुश नजर आ रहे हैं उनके अच्छे हालात दीख रहे हैं तब उसकी बहन थाली में हीरे, जेवरात लेकर उनका स्वागत करने के लिए आई । उसके बाद रानी ने जो भोजन जमीन में गाड़ा था उसको खोदा तब वह रोटी सोने की बन गई थी । रानी ने वह सोने की रोटी निकालकर बहन की थाली में रख दी और वह आगे की ओर चल दिए । जब राजा रानी अपने मित्र के गांव पहुंचे तब उनका पहले से भी ज्यादा स्वागत किया गया और जब वह उस कमरे में वापस आराम कर रहे थे तब उसी मोर ने वह हार उगल दिया ।

उसी समय रानी ने उस मित्र की पत्नी को बुलाया और सारी कहानी बताई तब दोस्त की पत्नी यानी वहाँ की रानी ने उनसे माफी मांगी और उनको सम्मान के साथ विदा किया । राजा रानी आगे चल दिए और वह भील राजा महल पहुंच गए और वहां के राजा से अपने बच्चों को मांगने लगा लेकिन उस राजा ने बच्चों को वापस करने से मना कर दिया तब राजा रानी ने गांव के लोगों को अपनी कहानी बताई तब गांव के लोगों ने राजा रानी को अपने बच्चे वापस दिलवाए और वह अपने राज्य की ओर चल दिए । जब राजा रानी अपने गांव के निकट पहुंचे तो गांव के लोगों ने उनके पास धन संपत्ति, घोड़ा, हाथी देखकर उनका स्वागत किया । वह अपने राज्य में रहने लगे थे । पहले की तरह बे धनवान हो गए थे । राज्य के लोग उनका फिर से मान सम्मान करने लगे थे । जब दशा माता का दिन आया तब राजा रानी ने पूरे राज्य को सजाया था और दशा माता का व्रत किया था । दशा माता का व्रत जो भी व्यक्ति करता है उसके घर में सुख समृद्धि आती है ।

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