दानवीर कर्ण की कहानी Danveer karna story in hindi

Danveer karna story in hindi

दोस्तों सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण वास्तव में एक ऐसे योद्धा थे जिनके किस्से आज भी मशहूर हैं वह किसी के द्वारा मांगे हुए दान को जरूर देते थे इनके जीवन से जुड़ी दो कहानिया हम आपके साथ शेयर कर रहे है

Danveer karna story in hindi
Danveer karna story in hindi

पहली कहानी

एक समय की बात है की दानवीर कर्ण की विशाल शक्तियों और कवच कुंडल को देखकर इंद्रदेव सोचने लगे कि यदि दानवीर कर्ण के पास सुरक्षा कवच रहा तो किसी के लिए भी उससे युद्ध जीतना नामुमकिन है और मेरा पुत्र अर्जुन युद्ध हार जाएगा इसीलिए इंद्र एक ब्राह्मण का भेष बनाकर दानवीर कर्ण के दरबार में पहुंचे वहां पर बहुत सारे ब्राह्मण लाइन में लगे हुए थे वह भी दान लेने के लिए लाइन में खड़े हुए और जैसे ही इंद्रदेव का नंबर आया तो दानवीर कर्ण उनसे बोले ब्राह्मण कहिए आपको दान में क्या चाहिए तभी इंद्रदेव ने दानवीर कर्ण से उनके सुरक्षा कवच कुंडल मांग लिए.

दानवीर कर्ण ने सुरक्षा कवच देने के लिए ज्यादा नहीं सोचा और उन्होंने अपना खंजर निकाल के अपने कवच और कुंडल इंद्रदेव को दे दिए.कवच और कुंडल जब इन्द्र लेकर जा रहे थे तभी उनका रथ जमीन में धंस गया और आकाशवाणी हुई कि तुमने दानवीर कर्ण के साथ धोखा किया है तुम उसे कोई चीज दान दो नहीं तो तुम यहां से नहीं जा पाओगे तभी इंद्रदेव पूण: अपने रूप में ही कर्ण के पास गए और उससे कुछ मांगने के लिए कहने लगे

लेकिन कर्ण ने यह कहा कि मैंने अपने पूरे जीवन में सिर्फ दान किया है किसी से भी उधार नहीं लिया है मैं आपसे कुछ नहीं मांगूंगा तब इंद्रदेव ने उन्हें ब्रज शक्ति दे दी और कहा कि तुम इस शक्ति का जिस पर भी उपयोग करोगे वह बच नहीं पाएगा चाहे वह काल भी स्वयं क्यों ना हो इस तरह से इंद्रदेव दानवीर कर्ण को अपना ब्रज देकर वहां से चले गए वास्तव में दानवीर कर्ण एक सच्चे दानवीर थे.

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दूसरी कहानी

एक समय की बात है की अर्जुन अपने आपको दानवीर कर्ण से श्रेष्ठ समझते थे लेकिन श्री कृष्ण दानवीर कर्ण के बारे में कहते थे कि इस दुनिया में दानवीर कर्ण से बढ़कर दानवीर कोई भी नहीं है लेकिन अर्जुन को यह अच्छा नहीं लगता था एक दिन अर्जुन के दरबार में एक ब्राह्मण आया और कहने लगा कि महाराज मेरी पत्नी की अंतिम इच्छा थी की उसका अंतिम संस्कार मैं चंदन की लकड़ीयो से करो तभी अर्जुन ने अपने पूरे राज्य में देखा लेकिन चंदन की लकड़ी कहीं पर भी नहीं थी और उस ब्राह्मण को निराश होकर अर्जुन के दरबार से जाना पड़ा उसके बाद वह ब्राह्मण कर्ण के पास गया उन्होंने दानवीर कर्ण से भी चंदन की लकड़ी की मांग की.

दानवीर कर्ण ने भी पूरे राज्य में चंदन की लकड़ी दिखवाई लेकिन उन्हें कहीं पर भी चंदन की लकड़ी नहीं मिली फिर बाद में दानवीर कर्ण ने चंदन के बने हुए अपने दरबार के खम्बो को उखड़वाने का आदेश दिया और चंदन की लकड़ी उस ब्राह्मण को दान दे दिए
इस तरह से हम जान सकते हैं कि वास्तव में दानवीर कर्ण से बढ़कर कोई भी नहीं था वह महान थे.

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