बाबा हरभजन सिंह का इतिहास व् जीवनी Baba harbhajan singh history in hindi

Baba harbhajan singh history in hindi

दोस्तों आज हम आपको इस बेहतरीन लेख के माध्यम से बाबा हरभजन सिंह के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और बाबा हरभजन सिंह की जीवनी को पढ़ते हैं ।

baba harbhajan singh history in hindi
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image source –https://www.indiatimes.com/cultur

जन्म स्थान – बाबा हरभजन सिंह का जन्म 3 अगस्त 1941 को कपूरथला पंजाब के ब्रोनदल नामक ग्राम में हुआ था । बाबा हरभजन सिंह एक बहादुर जवान थे ।उन्होंने अपनी शक्ति और बल से कई बार सीमा पर देश की रक्षा की है । हम बात कर रहे हैं बाबा हरभजन सिंह के बारे में । वह बहुत ही बुद्धिमान एवं शक्तिशाली सैनिक थे । उनको कभी भी अपनी मौत से डर नहीं लगता था । वह भारत माता की सीमा पर निडर होकर खड़े रहते थे । उन्होंने कभी भी दुश्मन से हार नहीं मानी । वह हमेशा बंदूक हाथ में लेकर भारत माता की सीमा पर सीना चौड़ी करके दुश्मनों से लड़ाई करते थे ।

शिक्षा – बाबा हरभजन सिंह ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई अपने गांव के ही एक सरकारी स्कूल से की थी । इसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए 1955 को डी.एल.डी हाई स्कूल में एडमिशन लेने के लिए चले गए और वहीं से मैट्रिकुलेशन किया था । इस तरह से बाबा हरभजन सिंह ने अपनी पढ़ाई की । इसके बाद उन्होंने भारतीय सैनिक बनने का फैसला किया और उन्होंने सैनिक बनने के लिए मेहनत करना प्रारंभ कर दिया था ।

बाबा हरभजन सिंह का सैनिक सफर – बाबा हरभजन सिंह ट्रेनिंग के दौरान अच्छे नंबर प्राप्त किए और बाबा हरभजन सिंह को 1956 में सैनिक बनाया गया । सबसे पहले बाबा हरभजन सिंह को सिग्नल कॉम में शामिल किया गया था और उन्होंने वहां पर पूरी जिम्मेदारी से काम किया था । वह ड्यूटी के दौरान किसी तरह की कोई भी चूक नहीं करते थे । पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभाते थे । उनका व्यवहार बहुत ही अच्छा था ।

उनके साथ में रहने वाले साथियों के साथ वह अच्छी तरह से घुलमिल गए थे और हमेशा अपने साथियों से देशहित की बातें किया करते थे । जब 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच में बहुत बड़ा युद्ध हुआ तब बाबा हरभजन सिंह ने अपनी यूनिट के लिए महत्वपूर्ण काम किए थे ।  अपने साथियों के साथ मिलकर इस लड़ाई को बहुत अच्छी तरह से लड़ी थी । अपनी रेजिमेंट के साथ मिलकर इस युद्ध में जीत प्राप्त की थी । 1965 का युद्ध उनका  पहला युद्ध था ।

उन्होंने इस युद्ध में अपनी पूरी जिम्मेदारी निभाई थी । किसी तरह की कोई भी चूक इस युद्ध में नहीं की थी । अपने साथियों के साथ मिलकर इस युद्ध को वह पूरी तरह से लड़ रहे थे । इस युद्ध के बाद बाबा हरभजन सिंह को 18 राजपूत रेजीमेंट में शामिल किया गया था । एक बार जब वह चीन की सीमा एवं सिक्किम की सीमा नाथूला दर्रा पर अपने साथियों के साथ जा रहे थे तब उनका पैर स्लिप हो गया और यह एक बड़ी खाई में जा कर गिर पड़े ।

उस खाई में गिरने के कारण उनकी मौत हो गई । उनकी मौत के बारे में ऐसा कहा जाता है की बाबा हरभजन सिंह की मौत के बाद उनकी आत्मा ने उनके दोस्त को मौत के बारे में बताया था । उनकी आत्मा ने दोस्त से कहा था कि उनकी लाश किस  जगह पर है । जब उनके दोस्त अपने सैनिक भाइयों के साथ उस जगह पर गए तब बाबा हरभजन सिंह की लाश उसी जगह पर मिली थी । सपने में अपने मित्र से बाबा हरभजन सिंह ने यह भी कहा था कि उनकी कब्र बनाई जाए ।

उन्हीं के कहने के अनुसार उनकी कब्र एवं मंदिर भी बनाया गया है और उस मंदिर के दर्शन के लिए काफी लोग जाते हैं । बाबा हरभजन सिंह के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह मरने के बाद भी देश की सीमा पर गश्त देते हैं । भारत के सैनिक यह मानते ही हैं कि बाबा हरभजन सिंह अभी भी देश की रक्षा के लिए सीमा पर गश्त देते हैं । भारत के साथ साथ चीन के सैनिक भी यह कहते हैं कि बाबा हरभजन सिंह को उन्होंने घोड़े पर गश्त देते हुए देखा है ।

भारत सरकार भी यह मानती है कि बाबा हरभजन सिंह सीमा पर गस्त देते हैं और उनकी तनख्वाह भी उनके परिवार को दी जाती है । बाबा हरभजन सिंह की मृत्यु 11 दिसंबर 1968 नाथूला दर्रा सिक्किम में हुई थी और इसी खाई के आसपास उनकी आत्मा देश की सीमाओं पर गश्त देती हैं ।

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