आलस्य मनुष्य का शत्रु “alasya manushya ka shatru kahani”

एक महात्मा थे,उनका एक शिष्य उन्हें बड प्रिय था,वोह हमेशा गुरु की सेवा करता और गुरु का आदर भी करता था,लेकिन वोह बहुत ही आलसी था,

गुरूजी ने सोचा की आखिर इसका आलस्य ख़तम कैसे किया जाए,एक दिन गुरूजी ने एक काला पत्थर उस शिष्य को देते हुए कहा की में २ दिन के लिए बहार जा रहा हु,ये जादुई काला पत्थर अपने पास रखो,ये पत्थर तुम लोहे से बनी जिस वस्तु पर रखोगे वोह वस्तु सोने की हो जाएगी.

लेकिन ये पत्थर में तुम्हे सिर्फ २ दिन के लिए दे रहा हु इसके बाद तुमसे ये बापिस ले लूँगा,इतना कहकर गुरूजी वहां से चले गए. 

अब शिष्य तोह आलसी था,उसने सोचा वाह किस्मत खुल गयी,एक दिन उसने सपने देखते देखते गवा दिया,वोह सुबह से शाम तक सोचता रहता की मेने बहुत साड़ी लोहे की वस्तुओ को सोने की बना दिया,और में अमीर बन गया,मेरे पास सब कुछ है और मुझे पानी पीने के लिए भी बिस्तर से उठाना नहीं पड़ रहा है,सब कुछ मेरे हुकुम देने पर मेरे नोकर ले आते है,एक दिन तोह उसे इस तरह के सपने देखते देखते ही निकल गया.

अगले दिन उसने सोचा की चलो आज बाजार से कुछ लोहे की वस्तुए लेने के लिए चलेंगे,तोह उसने सोचा रुक जाते है,थोडा आराम करके चलेंगे,बैसे भी गुरूजी तोह कल आयेंगे.

दोपहर हो चूका था,अपने दोस्तों के साथ शाम भी हो गयी,अब उसकी नींद लग गयी,नींद में वही सपने उसको नजर आने लगे,इतने में सुबह हुयी.

तभी गुरूजी आये उन्होंने कहा लाओ वोह जादुई काला पत्थर मुझ दे दो.तब उस शिष्य ने वोह पत्थर अपने गुरु को दे दिया लेकिन शिष्य समझ चूका था,की मेरे पास कितना अच्छा मौका था,में अमीर बन सकता था,लेकिन मेरे आलस ने मुझे कुछ भी नहीं करने दिया.

उसी time उस शिष्य ने कसम खायी की आज के बाद में आलस कभी नहीं करूँगा,आलस्य मेरा सबसे बड़ा शत्रु बन गया.

दोस्तों वाकई में अगर हमारा सबसे बड़ा शत्रु कोई होता है तोह वोह आलाश्य ही होता है इसलिए इन्सान को कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए.

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