लच्छू महाराज की जीवनी Lachhu maharaj biography in hindi

Lachhu maharaj biography in hindi

Lachhu maharaj history in hindi – दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से भारत के महान कथक नृतक लच्छू महाराज के जीवन परिचय के बारे में बताने जा रहे हैं । चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं और भारत के कथक नृतक लच्छू महाराज के जीवन परिचय के बारे में गहराई से पढ़ते हैं ।

Lachhu maharaj biography in hindi
Lachhu maharaj biography in hindi

Image source – https://indianexpress.com/article/trending/lachhu-maharaj-remembered-on-74th-birth-anniversary-wit

जन्म स्थान व् परिवार Place of birth and family- लच्छू महाराज का जन्म भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य के बनारस में हुआ था । लच्छू महाराज का पूरा नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था । लच्छू महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के बनारस में 16 अक्टूबर 1944 को हुआ था । वह शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे । जब वह तबला वादन करते थे तब सभी लोगों के पैर नाचने के लिए , नृत्य करने के लिए फड़कने लगते थे । लच्छू महाराज के पिता का नाम वासुदेव महाराज था ।लच्छू महाराज 12 भाई बहन थे ।

लच्छू महाराज 12 भाई बहनों में चौथे नंबर के थे । लच्छू महाराज बचपन से ही तबला वादन में रुचि रखते थे । लच्छू महाराज को तबला वादन में अपने पिता से ज्ञान प्राप्त हुआ था । क्योंकि लच्छू महाराज के परिवार में तबला वादन की शिक्षा दी जाती थी । उनके परिवार में सभी तबला वादन में प्रसिद्धि हासिल कर चुके हैं । लच्छू महाराज भी अपने परिवार की परंपरा को बढ़ाने के लिए कथक नृत्य की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कथक नृत्य की शिक्षा लेकर एक अच्छे कथक नृतक  बने हैं ।

जब वह तबला वादन करते हैं तब उनके तबला वादन को सुनने वाले लोग नाचने लगते हैं ।  लच्छू महाराज जब तबले पर अपनी थाप छोड़ते थे तब उनके तबले से एक सुरीली धुन निकलती थी और उस धुन पर सभी के पैर नाचने के लिए फड़फड़ाने लगते थे । यही उनकी सबसे बड़ी कला थी । उन्होंने अपनी इस कला से भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपना नाम कमाया है । उनके तबला वादन को सुनने के लिए विदेशों मे उनको बुलाया जाता था ।

लच्छू महाराज विदेशों में तबले की धुन सुनाने के लिए जाया करते थे । लच्छू महाराज का विवाह एक फ्रांसीसी महिला टीना से हुआ था । जब लच्छू महाराज ने फ्रांसीसी महिला टीना को देखा तब लच्छू महाराज को टीना से प्रेम हो गया था और उन्होंने फ्रांसीसी महिला टीना के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था ।  फ्रांसीसी महिला  टीना  भी लच्छू महाराज को पसंद करती थी और फ्रांसीसी महिला टीना ने लच्छू महाराज के विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था और दोनों ने शादी कर के विवाह के बंधन में बंध गए थे ।

लच्छू महाराज और फ्रांसीसी महिला टीना की एक संतान है और वह बड़ी हो गई है । जो फिलहाल की स्थिति में स्विजरलैंड में रहती हैं । लच्छू महाराज ने अपनी मेहनत और लगन से कथक नृत्य एवं भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं तबला वादक में  प्रसिद्धि हासिल की है । कई लोग उनके तबला वादन को सुनने के लिए बेकरार रहते हैं क्योंकि उनकी कला बहुत ही अच्छी है । लच्छू महाराज पैसों के लिए काम नहीं करते थे   । लच्छू महाराज एक कलाकार के रूप में काम करते थे ।

लच्छू महाराज का कहना था कि कलाकार की कीमत पैसा नहीं होती है । एक कलाकार की कीमत दर्शकों की तालियां , दर्शकों की प्रशंसा होती है क्योंकि वह एक सुंदर कलाकार थे । उनके अंदर काबिलियत कूट-कूट कर भरी हुई थी और उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना एक सफल भारतीय शास्त्रीय संगीतकार एवं तबला वादक बनने का बना लिया था । उन्होंने 8 वर्ष की उम्र से तबला बजाना प्रारंभ कर दिया था ।

जब वह अपनी 8 साल की उम्र में तबला वादन करते थे तब बड़े-बड़े तबला वादक शांत बैठ कर उनके द्वारा तबला वादक को सुनते थे क्योंकि वह बचपन से ही तबला वादक में उस्ताद रहे हैं । जो भी उनके तबला वादक को सुनता था वह यही कहता था कि वे आगे चलकर भारत का एक अच्छा तबला वादक कथक नृतक बनेगा और लच्छू महाराज ने अपना यह सपना पूरा कर दिया था ।

लच्छू महाराज की प्रारंभिक शिक्षा Early education of Lachhu Maharaj – लच्छू महाराज ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बनारस से की थी । लच्छू महाराज अपने घर से ही शिक्षा प्राप्त करते थे । अपने माता-पिता के माध्यम से उनको ज्ञान प्राप्त होता था । इसके बाद लच्छू महाराज स्कूली पढ़ाई करने के लिए बनारस के ही एक स्कूल में पढ़ने के लिए जाने लगे थे । जहां से लच्छू महाराज ने अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी । अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ लच्छू महाराज शास्त्रीय संगीत को भी सीखने के लिए जाया करते थे ।

तबला वादक के यहां पर तबला सीखने के लिए जाते थे और जब भी उनको समय मिलता था वह तबला बजाने लगते थे । सबसे ज्यादा उनकी रूचि तबला बजाने  में रही है । जब भी वह स्कूल में पढ़ाई करने के लिए जाते थे तब वह अपने दोस्तों से  तबले के बारे में बातचीत किया करते थे । अपने टीचरों से भी वह तबले के बारे में बातचीत करते थे । उनके टीचर उनसे यह कहते थे कि  तुम्हारी इच्छा यदि तबला वादक बनने में हैं तो तुम अपने सपने को पूरा करने के लिए पढ़ाई के साथ साथ शास्त्रीय संगीत को सीखने में  मेहनत करो ।

यदि तुम पूरी मेहनत के साथ एक सफल इंसान बनना चाहते हो तो वही करो जो तुम्हें अच्छा लगता हो क्योंकि तुम्हें तबला बजाना बहुत अच्छा लगता है । भारतीय शास्त्रीय संगीत में तुम्हें बहुत रुचि है । इसलिए तुम्हें उस पर सबसे ज्यादा फोकस करना चाहिए और लच्छू  महाराज ने ऐसा ही किया ।जिसके बाद वह भारत के , पूरे विश्व के जाने-माने तबला वादक हैं , कथक नृतक हैं । उनकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है ।

ऐसे लोग भारत में ही जन्म लेते हैं जो कलाकार ख्याति प्राप्त करते हैं । भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है क्योंकि वह अपनी मेहनत से , अपनी कलाकारी से कई लोगों को प्रसन्न कर चुके हैं । दर्शकों ने उनको पसंद किया है और उनका भी यही कहना है मुझे सिर्फ दर्शकों का प्यार चाहिए , दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट चाहिए इसके अलावा मुझे कुछ भी नहीं चाहिए । इसी कारण से सभी दर्शक लच्छू महाराज के शास्त्रीय संगीत को सुनने में रुचि रखते थे ।

लच्छू महाराज जब तबला बजाते थे तब उनके मुखड़े पर मुस्कुराहट दिखाई देती थी । लच्छू महाराज तबला बजाने  के साथ साथ गाना भी गुनगुनाते थे । जब वह तबला बजाते थे तब एक सुरीली धुन तबले के माध्यम से सुनाई देती थी । उसी सुरीली धुन को सुनने के लिए सभी लोग बेकरार रहते थे । जब लच्छू महाराज तबला बजाते थे तब सभी लोगों को नाचने का , झूमने का मन करता था ।

शास्त्रीय संगीत की शिक्षा एवं तबला वादक की शिक्षा Lachhu Maharaj’s classical music education & kathak in hindi- लच्छू महाराज ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा अपने घर से ही प्राप्त की थी । उनके पिता उनको शास्त्रीय संगीत का ज्ञान देते थे और लच्छू महाराज कथक नृतक को सीखने में अपना दिमाग लगाते थे । जब उनको समय मिलता लच्छू महाराज अपने पिता के साथ में तबला लेकर बैठ जाते थे और अपने पिता से तबला सिखाने के लिए कहते थे । उनके पिता जब उनकी रुचि एक तबला वादक के रूप में देखते थे तब उनको बड़ी प्रसन्नता होती थी । क्योंकि उनके पिता यह जानते थे कि यही उनके परिवार का सबसे बड़ा हुनर है । इसी हुनर को सीखने में उनकी रुचि है ।

उनके पिता उनको तबला वादक का ज्ञान देते थे । लच्छू महाराज उपलब्धि हासिल करने के लिए शास्त्री संगीत को और भी गहराई से सीखने के लिए अवध के नवाब के पंडित के यहां पर शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए चले गए थे ।  उन्होंने शास्त्री संगीत को सीखा और हिंदुस्तान शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उन्होंने अपना नाम रोशन किया है । वह एक अच्छे तबला वादक के रूप में जाने जाते हैं ।

उन्होंने एक तबला वादन के रूप में अपने कैरियर की धमाकेदार शुरुआत की और इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा । आज  भारत मे ही नही बल्कि कई देशों में उनके नाम का डंका बजा है और काफी लोग उनके तबला वादन को सुनने के लिए बेकरार रहते हैं । यही उनकी सबसे बड़ी कलाकारी है । कलाकार को जब दर्शकों का प्यार मिल जाता है तब वह अपने जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लेता है क्योंकि कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी दर्शकों की तालियां ही होती हैं ।

फिल्म जगत के जाने-माने अभिनेता गोविंदा और लच्छू महाराज का गहरा संबंध lachhu maharaj and govinda relation- फिल्म जगत के जाने-माने अभिनेता गोविंदा लच्छू महाराज के भतीजे है । फिल्म जगत के अभिनेता गोविंदा  भी उनसे बहुत ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं । गोविंदा अपने प्रारंभिक जीवन काल में लच्छू महाराज से तबला वादन का ज्ञान प्राप्त करते थे । लच्छू महाराज के साथ वह अपना अधिक समय बताया करते थे । जब लच्छू महाराज का निधन हुआ तब गोविंदा में यह कहा था कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को बहुत बड़ी क्षति हुई है क्योंकि भारतीय शास्त्रीय संगीत के लच्छू महाराज ज्ञाता थे ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत का लच्छू महाराज को काफी ज्ञान था । लच्छू महाराज के  माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत ऊंचाइयों तक पहुंचा है । लच्छू महाराज के माध्यम से भारत का यह शास्त्रीय संगीत कई देशों में पहुंचा है । कई देशों में भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रशंसा होती है ।  लच्छू महाराज के निधन के बाद भारत को बहुत बड़ी क्षति हुई है । जिसकी हम भरपाई नहीं कर सकते हैं और अभिनेता गोविंदा ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया था क्योंकि गोविंदा लच्छू महाराज से बहुत प्रेम करते थे ।

उनके प्रारंभिक जीवन में लच्छू महाराज ने उनका बहुत साथ दिया था ।

फिल्म इंडस्ट्रीज में लच्छू महाराज का महत्वपूर्ण योगदान – भारतीय बॉलीवुड फिल्मों में  लच्छू महाराज का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है क्योंकि जब वह फिल्म इंडस्ट्रीज में अपना योगदान देने के लिए मुंबई गए तब उन्होंने अपने कैरियर की धमाकेदार शुरुआत की थी । उन्होंने 1949 को महल फिल्म में भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं एक तबला वादक के रूप में अपना योगदान दिया था ।

वह फिल्मों में कथक नृतक कोरियोग्राफर के रूप में अपना योगदान देते थे क्योंकि फिल्म को सफलता की ओर ले जाने के लिए कथक नृतक कोरियोग्राफर का बहुत बड़ा योगदान रहता है और महल फिल्म मे लच्छू महाराज ने कथक नृतक कोरियोग्राफर के रूप में काम किया और उस फिल्म को एक सफल फिल्म बना दी थी । लच्छू महाराज एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने शास्त्रीय संगीत , तबला वादक को  अपना जीवन साथी बना लिया था ।

इसके बाद लच्छू महाराज को 1960 में मुग़ल-ए-आज़म फिल्म मे कथक नृतक कोरियोग्राफर के रूप में काम करने का मौका मिला और उन्होंने उस मौके को स्वीकार कर लिया था । जिसके बाद लच्छू महाराज ने कभी भी अपने जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखा है और आज वह एक सफल इंसान के रूप में पहचाने जाते हैं । 1965 में लच्छू महाराज को छोटा छोटा वोटेन फिल्म में काम करने का मौका मिला और उन्होंने अपने कथक कोरियोग्राफर की भूमिका उस फिल्म में निभाई थी ।

उस समय वह एक बेहतरीन अथक कोरियोग्राफर के रूप में पहचाने जाते थे क्योंकि फिल्म को सुपरहिट बनाने में वह अपना महत्वपूर्ण योगदान देते थे । 1972 में लच्छू महाराज को सुपरहिट फिल्म पाकीजा में काम करने का मौका मिला और उन्होंने कथक कोरियोग्राफर के रूप में पाकीजा फिल्म में काम किया था और वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही थी । लच्छू महाराज ने फिल्म इंडस्ट्रीज में काफी नाम कमाया था ।

जब वह फिल्म इंडस्ट्रीज में काम करने के लिए आए तब उनकी पहचान काफी ऊंचाई तक पहुंच गई थी ।

लच्छू महाराज के द्वारा उत्तर प्रदेश के लखनऊ में कथक केंद्र की स्थापना – लच्छू महाराज ने उत्तर प्रदेश राज्य के लखनऊ में कथक केंद्र की स्थापना की थी और कथक केंद्र की स्थापना करने का उनका एक ही उद्देश्य था कि भारत देश से भारतीय शास्त्रीय संगीत को सदियों तक जिंदा रखना क्योंकि जब भारतीय शास्त्रीय संगीत की चर्चा विदेशों में होती थी तब लच्छू महाराज को बहुत अच्छा लगता था । उन्हीं के कारण भारत देश की प्रशंसा विदेशों में तक हो रही है । इसीलिए  उन्होंने देश के युवाओं को भारतीय शास्त्रीय संगीत का ज्ञान देने के उद्देश्य से लखनऊ में कथक केंद्र की स्थापना की थी ।

लच्छू महाराज के कई विद्यार्थी विदेशों में एक सफल कथक कलाकार बने हैं । जो लच्छू महाराज को उनकी सफलता का श्रेय देते हैं क्योंकि लच्छू महाराज एक ऐसे व्यक्ति थे जो बात के धनी थे । वह जब किसी के सर पर अपना हाथ रख देते थे तब वह एक सफल इंसान बनने की ओर अपने कदम बढ़ा देता था । कई विद्यार्थियों को उन्होंने शिक्षा दी है और आज वह एक सफल इंसान हैं  । वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को भारतीय संगीत कलाकार बनाना चाहते थे और तबला वादक के रूप में कई विद्यार्थियों को शिक्षा देते थे ।

भारत की केंद्र सरकार ने उनको पद्म भूषण अवार्ड देने का निर्णय किया था – 1972 में लच्छू महाराज को केंद्र सरकार की ओर से पद्म भूषण पुरस्कार देने का निर्णय किया गया था । परंतु लच्छू महाराज ने इस पुरस्कार को लेने से मना कर दिया था और उन्होंने केंद्र सरकार को यह कहा था कि एक कलाकार को अवार्ड प्राप्त करने से कुछ नहीं होता । एक कलाकार की इनाम तो दर्शकों की तालियां होती हैं , दर्शकों का प्रेम होता है और वह प्रेम मैंने कमा लिया है ।

इसके अलावा मुझे कुछ भी नहीं चाहिए । इस तरह से लच्छू महाराज ने पद्म भूषण अविष्कार लेने से मना कर दिया था । इस अविष्कार को पाने के लिए लोग कई सालों तक मेहनत करते हैं और मेहनत करने के बाद  यह पुरस्कार मिलता है । उस प्रस्ताव को लच्छू महाराज ने स्वीकार करने से मना कर दिया था । बचपन से ही उनकी यह आदत रही है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार काम करते थे ।

पैसों के लिए वह कुछ भी नहीं करना चाहते थे वह एक अच्छे इंसान थे । उनकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है । ऐसे व्यक्ति ने भारत में जन्म लिया है हम सभी को इस बात का गर्व है । उनके निधन के बाद हम सभी को क्षति पहुंची है ।

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