रुके न तू कविता का भावार्थ Ruke na tu poem, bhavarth in hindi

रुके न तू कविता का भावार्थ

दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में पढ़ेंगे हरिवंश राय बच्चन जी की कविता रुके ना तू एवं इस कविता का भावार्थ तो चलिए पढ़ते हैं

धरा हिला, गगन गुंजा
नदी बहा, पवन चला
विजय तेरी, विजय तेरीे
ज्योति सी जल, जला
भुजा भुजा, फड़क फड़क
रक्त में धड़क–धड़क
धनुष उठा, प्रहार कर
तू सबसे पहला वार कर
अग्नि सी धधक धधक
हिरन सी सजग सजग
सिंह सी दहाड़ कर
शंख सी पुकार कर
रुके न तू थके न तू
झुके न तू थमे न तू
सदा चले थके न तू
रुके न तू झुके न तू
भावार्थ- हरिवंश राय बच्चन जी ने हमें इस कविता के जरिए बताया है की धरती हिल रही है और आसमान गूंज रहा है, नदी बह रही है और हवा चल रही है यह सभी तेरी विजय की कामना कर रहे हैं।
जीतने के लिए तेरी हर भुजा फड़क रही है, तेरे रक्त में संचार बढ़ रहा है अब तू तैयार हो जा और धनुष उठा और प्रहार कर, तू अग्नि की तरह धधक सकता है, हिरण की तरह सजग और शेर की तरह दहाड़ सकता है। तेरी इतनी पुकार है कि शंख की तरह तू चारों और पुकार सकता है।
हरिवंश राय बच्चन जी आग कहते हैं कि तू लगातार चलता रहे, कभी भी रुुका ना रहे, तू कभी भी थकेगा नहीं, किसी के आगे झुकेगा भी नहीं तू सदा चलता रहे और तू अपने कार्य में विजय पाएगा।
दोस्तों मेरे द्वारा लिखी हरिवंश राय बच्चन जी की कविता एवं भावार्थ आपको कैसा लगा हमें जरूर बताएं इसी तरह की कविता पढ़ने के लिए हमें सब्सक्राइब जरूर करें।

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